फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पुण्यतिथि विशेषः गिर्दा तुम याद आओगे...

Thu, 22 Aug 2013 03:59 PM IST
अमर उजाला, प्रवेश कुमारी, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
नल की टोंटी जल को तरसे,
विज्ञापन

हवा घरों में पानी बरसे
अरे ये निर्माण किए अभियंता, मुआयना अधिशासी
पानी बिन जमीन प्यासी, खेतों में भूख उदासी...

गिरीश चंद्र तिवारी उर्फगिर्दा! वह शख्स, जिसने अपने पहाड़ के हक के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ी। ऐसे जनगीत रचे, जो आंदोलनकारियों के लिए हौसला बने। उन्होंने खुद भी आगे बढ़कर जन अपेक्षाओं की मशाल उठाई। संघर्ष रंग लाया। राज्य बना।

अपनी सरकार बनी, लेकिन अपनी सरकार से जो अपेक्षाएं थीं, वह पूरी नहीं हुई। न पीने को पानी मिला, न वन पर अपना राज हुआ। राज्य केआम बाशिंदे की तरह गिर्दा भी हालात देख बेहद दुखी थे।
विज्ञापन


उनका यह दुख और आक्रोश एक बार फिर कलम के जरिए फिर बहा। जंगल में उग रहे कंक्रीट के जंगल और भू माफिया के बढ़ते हौसले पर चोट की। बोले-

बंगले में जंगला लग जाए और जंगले में बंगला लग जाए
अरे! वन बिल ऐसा लागू होगा मरे भले वन वासी...

एक व्यक्ति के रूप में कई-कई किरदार साथ जिए, लेकिन हर किरदार की खास बात बनी उसका जन मानस से जुड़ाव। हिंदी, कुमाऊंनी जिस भाषा में भी लिखा, उसमें आम आदमी की बात उठाई। कमीशन खोरों की वजह से जान-माल के नुकसान का हाल देखा तो लिखा-

जो कमाये सो रहे फकीरा, बैठे ठाले भरे जखीरा
भेद यही गहरा है कबिरा और दिखे बात जरा सी...

1945 में अल्मोड़ा जिले के ज्योलि गांव में जन्म लेने वाले गिर्दा ने 22 अगस्त 2010 को आखिरी सांस ली। अपने जीवन में ढाई दशक देखने के बाद ही खुद को समाज के लिए समर्पित कर देने वाले इस व्यक्तित्व ने नगाड़े खामोश हैं, धनुष यज्ञ जैसी कृतियां रचीं तो वहीं अंधा युग, अंधेर नगरी, थैंक यू मि. ग्लैड का नाट्य निर्देशन भी किया।

आज उन्हें गए तीन साल होने को हैं, लेकिन राज्य के हालात से सरोकार रखने वाले हर पहाड़वासी केदिल में वह जिंदा हैं। एक रचनाशील कर्मकार के रूप में उनकी कमी हर किसी को खलती है और साथी पुकारते हैं...कहां हो गिर्दा।

क्या कहते हैं गिर्दा को जानने वाले
गिर्दा को गए आज तीन साल हो गए। मुझे याद है कि जब उनका निधन हुआ था तो चंद्रोदय नाटक केमाध्यम से उनके कृतित्व को प्रणाम करने का प्रयास किया था। वह स्फटिक की तरफ साफ थे। बगैर जान-पहचान के किसी को भी अपनेपन से लबालब कर देने का हुनर था गिर्दा के पास।
विज्ञापन

-श्रीष डोभाल, वरिष्ठ रंगकर्मी, शैलनट।

मेरी फिल्म दायां या बायां में उन्होंने एक स्कूल शिक्षक की भूमिका अदा की थी। एक बेहद गंभीर व्यक्तित्व केसाथ काम कर रही थी, झिझक भी थी, लेकिन गिर्दा ने पूरी तरह आनंद लेकर वह रोल किया। वह उसमें इस तरह डूबे कि अभिनय करते तो पूरे मास्टर ही नजर आते।
-बेला नेगी, फिल्म निर्देशक, दायां या बायां।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें