84 वर्षों तक ट्रेनें कुएं के ऊपर गुजरती रही, लेकिन किसी को ट्रैक के नीचे कुएं के होने का अहसास तक नहीं हुआ। दो दिनों से जारी बारिश से ट्रैक के बीच में मिट्टी धंसने और छोटा सा होल दिखने पर कुएं का पता चला।
कुआं मिलने की सूचना पर रेलवे अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में रेलवे प्रशासन की ओर से कुएं को पाटने की कवायद शुरू कर दी गई।
प्लेटफार्म नंबर सात के नीचे है कुआं
रेल कर्मचारी गोविंद सिंह शनिवार सुबह सात बजे के आसपास रेलवे स्टेशन की ओर से आ रहे थे। उन्हें सात नंबर प्लेटफार्म के ट्रैक के नीचे मिट्टी धंसी दिखाई दी। पास गए तो उन्हें छोटा सा होल दिखाई दिया।
उन्होंने इसकी सूचना रेलवे इंजीनियरिंग विभाग को दी। इंजीनियरिंग विभाग की ओर से जांच की तो ट्रैक से करीब पांच फीट नीचे कुंआ दिखा।
1930 में बिछी थी रेलवे लाइन
रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर डीएस रावत ने बताया कि ब्रिटिश शासनकाल में बने सात नंबर प्लेटफार्म के ट्रैक के पांच फीट नीचे कुएं को लोहे के गार्डरों से ढककर पाटा गया था।
उन्होंने बताया कि गार्डर पर जंग लगने से गार्डर टूटने से मिट्टी धंसनी शुरू हुई, जिससे कुंआ दिखा। बताया कि 1930 के आसपास यह लाइन बनी होगी। कुएं की गहराई 30 फीट और चौड़ाई छह फीट बताई जा रही है।
प्लेटफार्म हुआ बंद
ट्रैक के नीचे कुंआ मिलने की सूचना के बाद रेल प्रशासन की ओर से प्लेटफार्म नंबर सात को अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया है। अगर समय रहते कुएं का पता नहीं चलता तो बड़ी अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता है।
प्लेटफार्म सात से चलती हैं तीन ट्रेनें
रेल प्रशासन का कहना है कि करीब दस वर्ष पूर्व छह, सात, आठ और नौ नंबर प्लेटफार्म का प्रयोग केवल कुंभ मेले के समय ही होता था। दस वर्षों में ट्रेनों की संख्या में इजाफा होने के कारण सात नंबर प्लेटफार्म पर दिल्ली पैसेंजर, हरिद्वार बाडमेर एक्सप्रेस और हरिद्वार एक्सप्रेस का संचालन किया जाता हैं।