उत्तराखंड के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के घने जंगलों में छिपी एक औषधीय वनस्पति जंगलों से निकलकर गांवों तक पहुंची तो ग्रामीणों की तकदीर बदल दी।
आर्थिक लाभ का जरिया
‘छीपी’ नाम की यह वनस्पति चमोली और पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्रों में किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ का जरिया तो बनी ही, गांवों से पलायन पर भी इससे रोक लगी।
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चमोली और पिथौरागढ़ के सीमांत ग्रामीण स्थानीय तौर पर गंदरायण कही जाने वाली इस वनस्पति के औषधीय गुण पहले से जानते थे। लेकिन, उन्हें मालूम नहीं था कि इसे गांव के खेतों में भी उगाया जा सकता है।
करीब चार वर्ष पूर्व जड़ी बूटी शोध एवं विकास संस्थान ने इस वनस्पति की खेती की जानकारी और प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया।
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अब पिथौरागढ़ के मिलम, मापा, गनघर, मारतोली, टोला, दारमा घाटी के नागलिंग, बालिंग, सौन, गौर और बोन एवं चमोली जिले के नीति, माणा गांवों में इसकी व्यावसायिक खेती की जा रही है।
शोध संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वीपी भट्ट बताते हैं कि पिथौरागढ़ की दारमा घाटी के बोन गांव के ग्रामीण जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान से परेशान थे।
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वे पलायन करने लगे थे। लेकिन अब छीपी की खेती करने के बाद बोन, तेदांग, सोन आदि गांवों में पलायन रुक गया है।
यह है औषधीय गुण
छिपी की जड़ों को बुखार और पेट की बीमारियों एसिडिटी, भूख न लगना, कब्ज आदि में इस्तेमाल लाई जाती है। इसकी जड़ के पाउडर को मसाले के तौर पर भी प्रयोग किया जाता है।
स्थानीय स्तर पर है बड़ी मांग
छीपी के औषधीय गुणों को देखते हुए स्थानीय स्तर पर इसकी बड़ी मांग है। राज्य सरकार द्वारा स्थापित भेषज संघ इसे क्रय करता है। एक नाली भूमि पर तीन साल में इसका उत्पादन 75 किलोग्राम होता है।
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ग्रामीणों को छीपी के व्यावसायिक उत्पादन की जानकारी दी गई। इसके बाद जंगलों में उगने वाली छीपी गांवों के खेतों तक पहुंच गई। अब पिथौरागढ़ के सीमांत गांवों में इसकी फसल से खेत लहरा रहे हैं। इसकी स्थानीय बाजार में कीमत प्रति दस ग्राम दस रुपये है।
- डॉ. विजय प्रसाद भट्ट, वैज्ञानिक, जड़ी-बूटी शोध एवं विकास संस्थान