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वायु और ध्वनि प्रदूषण की तरह फैल रहा वाणी प्रदूषण : मांझी

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देहरादून। अश्विन पूर्णिमा के महत्व और थेरवाद बौद्ध धर्म में भिक्षुओं के वर्षावास विषय पर सोमवार को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। राजपुर रोड स्थित एक होटल में आयोजित सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत की।
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उन्होंने बातचीत, सोशल मीडिया, टीवी डिबेट्स और सार्वजनिक मंचों पर लगातार अभद्र, अपमानजनक और आक्रामक शब्दों का प्रयोग बढ़ने पर चिंता जताई। वायु और ध्वनि प्रदूषण की तरह यह सीधे तौर पर मानव मस्तिष्क, मानसिक शांति और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाता है और यह किसी भी समाज के लिए अच्छे संकेत नहीं है।
सम्मेलन में अश्विन पूर्णिमा के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के साथ ही थेरवाद बौद्ध परंपरा में वर्षावास की भूमिका पर चर्चा की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य बौद्ध धर्म की परंपराओं, शिक्षाओं और सांस्कृतिक विरासत के महत्व को समझना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विचारों का आदान-प्रदान करना था। सम्मेलन में भारत समेत भूटान, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका, वियतनाम और नीदरलैंड के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।
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केंद्रीय मंत्री मांझी ने कहा कि आज जब हम धर्म और जीवन शैली की बात करते हैं तो स्वाभाविक रूप में हमें भगवान बुद्ध के बारे में सोचना पड़ जाता है। शिक्षा का ये मतलब नहीं है कि किताबी ज्ञान लें, शिक्षा का मतलब है कि हर तरह का ज्ञान हमें होना चाहिए। डिग्री लेने मात्र से हम अपने को परिपूर्ण समझते हैं, लेकिन ये शिक्षा नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज तब ही शिक्षित और सभ्य माना जाएगा जब हम शिक्षा के साथ-साथ मानवीय मूल्यों (जैसे करुणा, सहानुभूति, ईमानदारी, अहिंसा और समादर) को अपने आचरण में उतारते हैं। केवल साक्षर होना या डिग्रियां प्राप्त करना शिक्षा नहीं है, वास्तविक शिक्षा वही है जो चरित्र निर्माण करे और व्यक्ति को संवेदनशील इंसान बनाए।
इस मौके पर लोकगायिका पद्मश्री डॉ. माधुरी बड़थ्वाल और अनुज हितो को विश्वशांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


उत्तराखंड से ही हुई सृष्टि और संगीत की उत्पत्ति: डॉ. माधुरी बड़थ्वाल

सम्मेलन में लोकगायिका पद्मश्री डॉ. माधुरी बड़थ्वाल ने मांगल गीत की प्रस्तुति से देश व विदेश के प्रतिनिधियों को उत्तराखंड की संस्कृति से रूबरू कराया। उन्होंने कहा कि हमारे गीत में सारे भगवान का आह्वान किया जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम देखना है तो वो संगीत में दिखेगा। उत्तराखंड से ही सृष्टि और संगीत की उत्पत्ति हुई है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का संगीत हर किसी के दिल में बसता है। आज परिवर्तन हो रहा है तो संगीत में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक होता है। जो तेरा-मेरा नहीं हमारा होता है उसे लोक संगीत कहते है। जो समाज में घटित होता है वो लोक गीत में होता है। इस मौके पर उन्होंने दैणा होयां खोली का गणेशा और मेरा बाजू रंगा... गीतों की प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया।
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