राजधानी समेत राज्य के तमाम इलाकों में मानसून ने दस्तक दे दी है। ऐसे में नगर निगम और सिंचाई विभाग के अधिकारियों को अब रिस्पना, बिंदाल जैसी नदियों के साथ ही नालों की सफाई की सुध आई है। नगर निगम और सिंचाई विभाग की ओर से नदियों के साथ ही नालों की सफाई को लेकर अभियान शुरू किया गया है।
बता दें, पिछले साल मानसून के दौरान किशन नगर, टीचर्स कॉलोनी समेत राजधानी के दो दर्जन से अधिक इलाकों में नए नालों का निर्माण नहीं होने और पुराने नालों की सफाई नहीं होने से तमाम इलाकों में जलभराव हो गया था। ऐसे में लोगों को जबरदस्त परेशानियों का सामना करना पड़ा था। स्थिति यह हो गई थी कि हजारों घरों में बारिश का पानी दाखिल हो गया था और लोगों के घरों में रखे लाखों का सामान तहस-नहस हो गया था।
पिछले साल की घटना से सबक लेते हुए निर्णय लिया गया था कि जिन इलाकों में मानसून के दौरान जलभराव की समस्याए होती हैं, वहां नए नालों का निर्माण करने के साथ ही पुराने नालों की सफाई समय रहते कराई जाएगी। इसे सिंचाई विभाग के अधिकारियों की लापरवाही कहें या कुछ और समय रहते कुछ भी पूरा नहीं हो पाया है। बहरहाल सिंचाई विभाग की ओर से कुछ निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं, लेकिन वह भी बहुत जल्द पूरे हो पाएंगे इसकी संभावना कम है। इस संबंध में सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता संदीप जैन से जानकारी चाही गई तो संपर्क नहीं हो पाया।
रिस्पना, बिंदाल और छोटी बिंदाल जैसी नदियों के साथ ही नालों की सफाई का कार्य तेजी से कराया जा रहा है। बारिश शुरू होने से पहले ही नदियों और नालों की सफाई का काम पूरा कर लिया जाएगा। वैसे तो नदियों, नालों की सफाई का काम मार्च-अप्रैल में पूरा किया जाना था, लेकिन कोरोना संकट के चलते नदियों और नालों की सफाई नहीं हो पाई। अब इस काम में तेजी लाई गई है।
-सुनील उनियाल गामा, महापौर
मौसम विज्ञान विभाग ने 13 जून को ही राज्य में मानसून के सक्रिय होने की घोषणा कर दी पर अगले ही दिन पूरे उत्तराखंड में बारिश का नामोनिशान नहीं रहा। ऐसे में मौसम विभाग की घोषणा पर सवाल भी उठे हैं। हालांकि अगले कुछ दिनों में बारिश की संभावना जताई गई है।
अमूमन उत्तराखंड में मानसून 20 जून तक आता है। लेकिन इस साल शुरुआती दौर में प्रदेश में 23 जून तक मानसून पहुंचने की संभावना जताई गई थी। लेकिन अब मौसम विज्ञानियों ने लगभग एक हफ्ते पहले उत्तराखंड में मानसून के दस्तक देने का एलान कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि 13 जून को मानसून के एलान के दिन ही प्रदेश के ज्यादातर इलाकों में पानी नहीं बरसा।
14 जून को तो पूरे प्रदेश में बारिश का नामोनिशान नहीं रहा। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि कहीं मौसम वैज्ञानिकों को कुदरत ने गच्चा तो नहीं दिया। वैसे भी मौसम विज्ञान दो दूनी चार जैसा गणितीय विज्ञान नहीं है। बहुत बार भविष्यवाणियां गलत भी हो जाती हैं। हालांकि उन्नत तकनीक और सैटेलाइट इमेज से तीन-चार दिनों की सटीक भविष्यवाणी करने का दावा भी मौसम वैज्ञानिक करते हैं। लेकिन यह दावा भी कई बार विफल हो जाता है।
मौसम विज्ञानी रोहित थपलियाल ने बताया कि वैसे तो अमूमन मानसून को केरल से उत्तराखंड पहुंचने में औसतन बीस दिन का समय लगता है। लेकिन इस बार मानसून की रफ्तार अधिक होने की वजह से यह दस दिन में ही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पहुंच गया है। मौसम विज्ञान के जो भी मानक हैं उन मानकों के अनुरूप मानसून ने दस्तक दे दी है। मानसून के दस्तक देने का ही परिणाम है कि मैदान से लेकर पहाड़ तक पिछले चार दिनों से कई इलाकों में मध्यम से लेकर भारी बारिश देखने को मिल रही है साथ ही तेज हवाएं भी चल रही है।
मानसून घोषित करने के मानक
जब मानसून सीजन के आसपास लगातार पांच दिन तक किसी राज्य के 70 फीसदी से ज्यादा इलाकों में बारिश होती है तो मौसम विभाग मानसून की सक्रियता का एलान करता है। उत्तराखंड के मामले मेें इसी मानक के आधार पर मानसून की घोषणा की गई। लेकिन अगले दिन ही बादलों की निष्क्रियता इस घोषणा पर सवाल खड़े कर रही है।