वहां से अपनी यात्रा जारी रखते हुए वह जौनपुर, जौनसार से रवांई, बावर, रुद्रप्रयाग, चमोली के सुखताल होते हुए ग्वालदम और थराली से कपकोट पहुंचे। वहां से पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और नैनीताल होते हुए उन्होंने 1400 किमी की पैदल यात्रा से पूरा उत्तराखंड नाप डाला।
यह लंबी यात्रा उन्होंने 22 फरवरी 1974 को मुनिकीरेती में पूरी की। इस दौरान उनके साथ उनके सहयोगी और सर्वोदयी घनश्याम सैलानी, आनंद सिंह बिष्ट, सुरेंद्रदत्त भट्ट आदि भी मौजूद रहे। यात्रा के दौरान बहुगुणा ने ग्रामीणों को शराबबंदी, ग्राम स्वराज, जातीय समानता, महिला शिक्षा और स्वावलंबन का महत्व बताते हुए अखबारों के माध्यम से भी ग्रामीणों की समस्याएं भी उजागर की।
जिस गांव में वे विश्राम करते वहां ग्रामीणों को अपनी यात्रा के अनुभव भी सुनाते। बताया जाता है, कि उनकी पीठ पर एक भारी पिट्ठू (बैग) होता था, जिसमें कपड़े और सूत कातने के लिए गांधी का चरखा और किताबें भी होती थी। यात्रा के दौरान उन्होंने देखा कि जहां जंगल काटे गए थे, वहां पहाड़ खिसक रहे थे, लेकिन जहां लोगों ने बांज और चौड़ी पत्ती के जंगलों को संरक्षित रखा था, वहां की फिजा ही अलग थी। इस यात्रा के दौरान उन्होंने तबाही के मंजर भी देखे। उसी दृश्य ने उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए आंदोलन शुरू करने के लिए प्रेरित किया था।