आंदोलनकारियों की जिद ने 1994 में तत्कालीन मुलायम सरकार को कौशिक समिति बनाने को मजबूर किया। कौशिक समिति ने गैरसैंण को राजधानी के उपयुक्त पाया। तब से गैरसैंण राज्य आंदोलनकारियों की राजधानी बन गई और इसका नाम चंद्रनगर रख दिया गया।
वर्ष 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में कैबिनेट बैठक की। भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन की नींव रखी। हरीश रावत मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने विधानसभा भवन का निर्माण शुरू कराया। तमाम आलोचनाओं को नजरांदाज करते हुए रावत ने बहुत तेजी से विधानसभा की भव्य इमारत खड़ी की।
विधानसभा में संकल्प लिया कि हर बजट सत्र गैरसैंण में होगा। लेकिन वे गैरसैंण को राजधानी बनाने की घोषणा करने का साहस नहीं दिखा सके। भाजपा ने अपने चुनावी दृष्टिपत्र में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का वादा शामिल किया। दो साल तक सरकार गैरसैंण को लेकर बेफिक्र सी दिखी। लेकिन तीसरे साल में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा करके बड़ा सियासी दांव चला है।
गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि पिताजी ने सपना देखा, मैंने उसे रूप देने की कोशिश की और आज मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उसमें रंग भर दिए।
ग्रीष्मकालीन राजधानी पर बहुगुणा ने मुख्यमंत्री को शुभकामनाएं दीं। बहुगुणा ने कहा कि इसका यश उनके पिता स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा को जाता है, जिन्होंने अलग पर्वतीय मंत्रालय बनाया।
उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर उस सपने को आकार देने का प्रयास किया और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उसमें रंग भरने का काम किया। उन्होंने कहा कि आज राज्य आंदोलनकारियों का सपना साकार हुआ। प्रदेश सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर शहीद आंदोलनकारियों को सच्ची श्रद्धांजलि दी।