धामी के कार्यकाल और कार्यशैली को देखें तो उनका विस्तार खामोशी से ही हुआ है। उन्होंने चुनाव के ठीक नौ महीने पहले मंत्रिमंडल के आकार को अपने मुताबिक बड़ा कर खुद के राजनीतिक कद और सफर को विस्तार दिया है। विधानसभा चुनाव में पराजित होने के बाद भी पार्टी ने उन्हें मौका दिया और ऐसे कई मौके आए जब केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर पूरा भरोसा जताया। धामी मंत्रिमंडल में वर्षों से खाली पांच पदों को भरने के बाद एक बात स्पष्ट हो गई है कि भाजपा नेतृत्व धामी सरकार की उपलिब्धयों और फैसलों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहा है। राज्य के अलग-अलग क्षेत्र और वर्गों से आए नए मंत्री सरकार की कार्यप्रणाली में जोश भरने का काम करेंगे।
अगले चुनाव में सरकार के नए नुमाइंदे सड़कों पर पार्टी का झंडा लेकर दिखेंगे। वहीं कुछ नए चेहरों के साथ सरकार पांच साल की सत्ता विरोधी लहर से भी पीछा छुड़ा पाएगी। भाजपा नेतृत्व चाहता तो वर्तमान मंत्रिमंडल के साथ ही सरकार कार्यकाल पूरा कर लेती लेकिन मुख्यमंत्री के पास जिस तरह विभागों का दबाव था, उससे चुनाव से पहले उन्हें हल्का किया गया है ताकि पार्टी चुनाव में उनका बखूबी इस्तेमाल कर सके। भाजपा में कोई भी फैसला बिना बात नहीं होता है।
हमेशा बड़े संदेश के साथ दूरगामी परिणाम के लिए नेतृत्व कमान सौंपता है। केंद्रीय मंत्री अमित शाह के हरिद्वार दौरे के बाद बड़ी स्पष्टता से पार्टी नेताओं को संदेश मिल गया था कि गुटबाजी या बयानबाजी को बंद कर 2027 के चुनाव में जुट जाएं। धामी मंत्रिमंडल के सभी पदों को भरने का फैसला लंबे समय लटका रहा और इन्हें भरने को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे। इस विस्तार के जरिये पार्टी के भीतरी समीकरणों में भी संतुलन बैठा दिया गया है।