संघ में प्रचारक से मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत को धैर्य का इनाम मिला है। 80 के दशक में राष्ट्र भावना से संघ की शाखाओं में गए और 20 साल की उम्र में ही प्रचारक बन गए। राजनीति सफर में चुनौतियों ने कई बार उनके धैर्य की परीक्षा ली। लेकिन उन्होंने कभी धैर्य को नहीं खोया। यही वजह है कि आखिरकार भाजपा हाईकमान ने कई दिग्गज नेताओं को छोड़ कर उन्हें मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी दी है।
राष्ट्र भावना से प्रेरित होकर तीरथ सिंह ने 80 के दशक में संघ की शाखाओं में जाना शुरू किया। उनकी कर्तव्य निष्ठा को देखते हुए संघ ने विस्तारक व प्रचारक की जिम्मेदारी थी। आठ साल तक प्रचारक की भूमिका निभाने तक उन्हें भाजपा के बारे में जानकारी दी। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल विहारी वाजपेयी के श्रीनगर गढ़वाल दौरे आने के बाद इसका पता लगा की भाजपा भी अपना परिवार है।
छात्र राजनीति से तीरथ ने अपना राजनीति सफर शुरू किया। वर्ष 1997 में पहली बार विधायक बने। राज्य गठन के बाद 2000 में प्रदेश के पहले शिक्षा मंत्री बने। 2007 में भाजपा प्रदेश महामंत्री की जिम्मेदारी संभाली। 2012 में पौड़ी जिले के चौबट्टाखाल विधानसभा सीट से चुनाव जीता और दूसरी बार विधायक बने।
सीटिंग विधायक होने के बावजूद भी 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। पार्टी के प्रति नाराजगी तो रही। लेकिन धैर्य नहीं खोया। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय सचिव के साथ ही हिमाचल प्रदेश का प्रभारी बना कर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। बतौर प्रभारी हिमाचल में चार लोक सभा सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की। उनके धैर्य को देखते हुए पार्टी हाईकमान ने मुख्यमंत्री बना कर इनाम दिया है।
राजनीति गुरु बीसी खंडूड़ी के बेटे के खिलाफ लड़ा लोक सभा चुनाव
वर्ष 2019 के लोक सभा में भाजपा ने तीरथ सिंह रावत को पौड़ी सीट से टिकट दिया। उनके सामने पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल(सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी के बेटे कांग्रेस प्रत्याशी मनीष खंडूड़ी के खिलाफ चुनाव लड़ने की चुनौती थी। तीरथ को बीसी खंडूड़ी का हनुमान माना जाता है। इस चुनाव में भी तीरथ ने मनीष को तीन लाख से अधिक वोट से पराजित किया।