एके 47 धारी सिपाहियों के दस्ते को पीछे धकेलते हुए कुख्यात बदमाश भूरा भाग गया। ये कोई अनहोनी नहीं। सिस्टम ने ही हमारे सिपाहियों को ऐसा बना दिया है कि कभी भी कोई भूरा ऐसा दुस्साहस कर सकता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि पुलिस कर्मियों के ‘रणछोड़’ रवैये और हथियारों के न चल पाने जैसी किरकिरी दोबारा न हो, इसके लिए विभागीय कार्यप्रणाली को नए सिरे से चुस्त-दुरुस्त करना ही पड़ेगा।
मुख्यमंत्री तक की नींद उड़ाने वाली यह घटना बीते 14 साल में अपराध व कानून व्यवस्था के मद्देनजर सूबे की मित्र पुलिस के लिए आईना है। यहां की पुलिस ने कभी भी संगठित अपराध को केंद्र बिन्दु बनाकर जवानों को उसी हिसाब से तेज-तैयार करने की जहमत नहीं उठाई।
पुलिस वालों को प्रशिक्षण के दौरान जाबांजी के गुर नहीं सिखाए जाते। प्रशिक्षण बस शारीरिक अभ्यास, कुछ पढ़ाई लिखाई और साफ सफाई भर का काम रह गया। विशेष सतर्कता बरतने की ट्रेनिंग देने का चलन भी खत्म हो गया। नियमित फायरिंग की कवायद इसीलिए कराई जाती है ताकि कैदी के भागने या मुठभेड़ के समय ये विद्या काम आए। लेकिन इसका भी बुरा हाल है।