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ठुकराए नवजातों के साथ ये कैसा 'सुलूक' कर रही पुलिस

Sun, 15 Nov 2015 01:40 PM IST
राकेश शर्मा / अमर उजाला, देहरादून
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जब जन्म देने वाली मां ही ने ठुकरा दिया तो फिर पुलिस क्यों जहमत उठाए? देहरादून में जहां-तहां नवजातों के शव मिलने के मामले में देहरादून पुलिस का यही रवैया है।
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नवजातों के शव मिलने पर कमोवेश देश भर की पुलिस का एक सा नजरिया है। उत्तराखंड पुलिस इस मामले में एक कदम और इस लिहाज से आगे है कि अन्य प्रदेशों में एफआईआर दर्ज करके अंतिम रिपोर्ट लगा दी जाती है, यहां एफआईआर तक दर्ज नहीं होती।

इस साल देहरादून पुलिस के सामने लावारिस नवजात या उनके शव मिलने की 15 मामले सामने आए, मगर पुलिस ने सभी प्रकरणों में जनरल डायरी (जीडी) में तस्करा (घटना का उल्लेख) डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। पुलिस का यह गैरकानूनी कदम ऐसा जघन्य अपराध करने वालों को अप्रत्यक्ष ही सही शह देने वाला है।
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देहरादून में रायपुर के शमशेरगढ़ नदी में करीब 22 दिन पहले नवजात शिशु का शव मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद भी पुलिस मामले की जांच को उलझाए है। डालनवाला क्षेत्र के रेसकोर्स रोड पर 15 दिन पहले एक कुत्ते के मुंह से नवजात शिशु का शव छुड़वाया गया था। पुलिस जांच कर रही है कि शव को कुत्ता किसी कब्र से तो नहीं लाया।

रायपुर के भगत सिंह कालोनी में ढाई माह पहले मिले नवजात शिशु की मौत का राज भी दफन हो गया। पुलिस ने कागजी कार्रवाई कर अपने दायित्व की इतिश्री कर ली। ऋषिकेश के शांति नगर में दो माह पहले कूडे़ के ढेर में मिले नवजात शिशु के एक पैर के तलवे में सरकारी अस्पताल की मुहर भी पाई गई थी। मामले में पुलिस ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की।

पुलिस का ऐसा रवैया बे‌हद चिंताजनक

उत्तराखंड पुलिस का यह रवैया इस लिहाज से भी चिंताजनक है कि राज्य की राजधानी देहरादून में लैंगिक अनुपात खतरनाक हद तक बिगड़ चुका है। यहां 1000 पुरुषों के मुकाबले मात्र 889 महिलाओं का अनुपात है। साल 2011 के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में 1000 पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या केवल 963 है।
 
हमारी ही तरह आपका भी मानना होगा कि ऐसे घृणित कार्य करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। कानून भी यही कहता है और उसने पुलिस को हर शिशु की मौत में छिपे तमाम राज का पता लगाकर दोषियों को कोर्ट में पेश करने का अधिकार दिया है, ताकि उन्हें सजा दी जा सके।

आईपीसी की धारा-317 के तहत माता-पिता या उसके देख-रेख करने वाले व्यक्ति द्वारा 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों का परित्याग करना कानूनी अपराध है। इसी तरह पैदाइश छुपाने के लिए नवजात को गोपनीय तरीके से जीवित अथवा मृत फेंकना धारा-318 आईपीसी के तहत अपराध है।

पुलिस को जरूरत के मुताबिक भारतीय दंड संहिता की इसी धारा-317 अथवा 318 आईपीसी के तहत हर लावारिस नवजात (जीवित-मृत) के मामले में एफआईआर दर्ज करना चाहिए। बावजूद इसके उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक इन धाराओं के तहत कोई भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।

जाहिर है कि मित्र पुलिस का दंभ भरने वाली दून पुलिस मासूमों की मौत के प्रति संवेदनहीन है। अफसर दावे पर दावे करते हैं, लेकिन उनके अधीन पुलिस अधिकारी एक भी मामले में मुकदमा दर्ज करने की जहमत तक नहीं उठाते।
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सात साल तक की हो सकती है सजा

आईपीसी की धारा-317 के तहत बारह वर्ष से कम आयु के शिशुओं का परित्याग करने वालों को सात साल के कारावास या फिर जुर्माना किया जा सकता। दोनों सजाएं भी एक साथ मिल सकती हैं। इसी तरह धारा-318 आईपीसी के तहत दो वर्ष तक का कारावास और जुर्माने के दंड का प्रावधान है।
- संजीव शर्मा, अधिवक्ता

पुलिस को कानून के मुताबिक मुकदमा दर्ज कर जांच पड़ताल करनी चाहिए। बाल विकास विभाग को इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
- डॉ. जाह्नवी तिवारी, कार्यकारी अध्यक्ष, दिशा एनजीओ

लावारिस मिलने वाले नवजात शिशुओं की मौत के मामले में मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान है। पता करेंगे कि अब तक इस तरह के मामलों में कितने केस दर्ज हुए हैं और उनमें क्या कार्रवाई हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद केस दर्ज करने में हीलाहवाली होती है तो यह गंभीर मामला है। जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. सदानंद दाते, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक
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