राज्य गठन के 19 साल के बाद होम्योपैथिक विभाग को ड्रग्स लाइसेंस बनाने का अधिकार मिल गया है। शासन ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है। अभी तक ऐलोपैथिक विभाग के माध्यम से होम्योपैथिक दवाइयां बनाने और बेचने के लिए लाइसेंस बनाए जाते थे, लेकिन अब होम्योपैथिक विभाग को लाइसेंस अथॉरिटी मिल गई है। निदेशक होम्योपैथिक को लाइसेंस प्राधिकारी और जिले स्तर पर जिला होम्योपैथिक चिकित्साधिकारियों को ड्रग्स निरीक्षक बनाया गया है।
सचिव आयुष दिलीप जावलकर की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत होम्योपैथिक विभाग ही होम्योपैथिक दवाइयां बनाने और रिटेल स्टोर के लाइसेंस जारी करेगा। नए लाइसेंस बनाने और नवीनीकरण के लिए निदेशक को लाइसेंस प्राधिकारी बनाया गया है। जबकि जिला होम्योपैथिक चिकित्साधिकारियों को ड्रग्स निरीक्षण के रूप में नियुक्त किया गया है।
विदित हो कि राज्य गठन के बाद होम्योपैथिक चिकित्सा को ऐलोपैथिक विभाग के अधीन किया गया था। 2004 में ऐलोपैथिक चिकित्सा से अलग कर होम्योपैथिक का निदेशालय बनाया गया, लेकिन लाइसेंस बनाने का अधिकार एलोपैथिक चिकित्सा के पास ही रखा गया। शासन व विभागीय स्तर पर होम्योपैथिक को ड्रग्स लाइसेंस देने का अधिकार देने की मांग काफी समय से हो रही थी।
अब जाकर होम्योपैथिक विभाग को लाइसेंस देने का अधिकार मिला है। निदेशक डॉ. राजेंद्र सिंह का कहना है कि अधिकार मिलने से दवाइयों की गुणवत्ता व निर्माण की निगरानी बेहतर ढंग से होगी। सिर्फ लाइसेंस देना काफी नहीं होता, बल्कि दवाइयां किस गुणवत्ता की बन रही है, इसकी मॉनीटरिंग भी जरूरी है। जो ऐलोपैथिक विभाग के अधीन रह कर नहीं हो सकती थी।