खेती की इस आधुनिक तकनीकी में मिट्टी के बिना जलवायु को नियंत्रित करके खेती की जाती है। हाइड्रोपोनिक खेती में केवल पानी में या पानी के साथ बालू एवं कंकड़ में पौधे उगाए जाते हैं। हाइड्रोपोनिक तकनीक में फास्फोरस, नाइट्रोजन, मैग्निशियम, कैल्शियम, पोटाश, जिंक, सल्फर, आयरन आदि कई पोषक तत्व एवं खनिज पदार्थों को एक निश्चित मात्रा में मिलाकर घोल तैयार किया जाता है। इस घोल को निर्धारित किए गए समय के अंतराल पर पानी में मिलाया जाता है। जिससे पौधों को पोषक तत्व मिलते हैं। हाइड्रोपोनिक खेती में पाइप का प्रयोग करके पौधों को उगाया जाता है। पाइप में कई छेद बने रहते हैं, जिसमें पौधे लगाए जाते हैं। पौधों की जड़ें पाइप के अंदर पोषक तत्वों से भरे जल में डूबी रहती हैं।
उगाई जा सकती हैं ये फसलें
इस तकनीकी के माध्यम से छोटे पौधों वाली फसलों की खेती की जा सकती है। इनमें गाजर, शलजम, ककड़ी, मूली, आलू, शिमला मिर्च, मटर, मिर्च, स्ट्रॉबेरी, ब्लैकबेरी, ब्लूबेरी, तरबूज, खरबूजा, अनानास, अजवाइन, तुलसी, पालक, धनिया, शिमला मिर्च, ब्रोकोली, पुदीना, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, टमाटर, खीरा, जड़ी बूटी आदि शामिल हैं।
हाइड्रोपोनिक खेती के फायदे
सही तरीके से हाइड्रोपोनिक खेती की जाए तो करीब 90 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है। परंपरागत खेती की तुलना में इस विधि से खेती करने पर कम जगह में अधिक पौधे उगाए जा सकते हैं। पोषक तत्व बर्बाद नहीं होते। इस्तेमाल किए जाने वाले पोषक तत्व पौधों को आसानी से मिल जाते हैं। इस तकनीक में मौसम, जानवरों या किसी अन्य प्रकार के बाहरी, जैविक एवं अजैविक कारणों से पौधे प्रभावित नहीं होते।
कई युवाओं ने अपनाई खेती
अनिकेत और प्रियांशु ने बताया कि इस तकनीक के कारण युवा खेती से जुड़ रहे हैं। बताया कि हमारे 10 में से आठ क्लाइंट ऐसे हैं जो 25 से कम उम्र के हैं। बतौर अनिकेत खेती का मतलब दिमाग में सबसे पहला ख्याल आता है कि बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। पूरा समय लगाना, लेकिन हाइड्रोपोनिक तकनीकी में ऐसा नहीं है। आपके कपड़े तक गंदे नहीं होते। एक साफ वातावरण होता है। हाइड्रोपोनिक तकनीकी टेक्नोलॉजी और फार्मिंग का मिश्रण है।