क्षतिपूर्ति वनीकरण (कैंपा) के तहत दस हजार ग्राम प्रहरियों को तैनात करने की प्रदेश सरकार की योजना को केंद्र सरकार ने हरी झंडी दे दी है। 11 जनवरी को दिल्ली में होने वाली नेशनल कैंपा एडवाइजरी काउंसिल की बैठक में इस पर अंतिम मुहर लगेगी।
प्रदेेश को इस समय जंगल की आग और वन्यजीवों से फसलों को नुकसान की दोहरी चुनौती से जूझना पड़ रहा है। इसका सामना करने के लिए ही कैंपा के तहत दस हजार ग्राम प्रहरियों को तैनाती देने की योजना तैयार की गई थी। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस योजना की की जानकारी भी दी थी। अब कैंपा की स्टेट स्टीयरिंग कमेटी भी इस योजना को हरी झंडी दे चुकी है। जिससे इस योजना का धरातल पर उतरना भी संभव हो गया है।
11 जनवरी को दिल्ली में नेशनल कैंपा एडवाइजरी काउंसिल के एजेंडे में इस प्रस्ताव को शामिल कर लिया गया है। वन विभाग का कहना है कि योजना पर सैद्धांतिक सहमति दे दी गई है। काउंसिल से योजना पर अंतिम मुहर लगने के बाद राज्य सरकार कैंपा फंड से पैसा निकाल पाएगी। वन मंत्री हरक सिंह खुद इस योजना की केंद्र के स्तर पर पैरवी कर रहे हैं।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर से इस मामले में बात की गई है। राज्य सरकार के प्रस्ताव पर उन्होंने सहमति दी है। कैंपा एडवाइजरी काउंसिल की दिल्ली में प्रस्तावित बैठक में इस प्रस्ताव पर चर्चा होगी। प्रस्ताव को मंजूरी मिलना भी तय है।
- हरक सिंह रावत, वन मंत्री
यह है योजना
कैंपा के तहत ग्राम प्रहरियों को बहुद्देशीय कर्मी के रूप में ग्राम स्तर पर तैनात किया जाना है। इनको जंगल की आग की निगरानी करने, फसलों को बंदरों और अन्य वन्यजीवों से बचाने का जिम्मा सौंपा जाना है। प्रदेश के स्तर से मुख्य सचिव ओम प्रकाश की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी जा चुकी है। योजना के तहत तैनात किए जाने वाले प्रहरियों को कैंपा फंड से मानदेय दिया जाना है।
दरअसल, प्रदेश के पास कैंपा के करीब 2600 करोड़ रुपये हैं। इनमें से 20 प्रतिशत का इस्तेमाल वनीकरण को बढ़ावा देने वाले काम में खर्च किया जा सकता है। इसी के तहत प्रदेेश सरकार ने कैंपा से ग्राम प्रहरियों की नियुक्ति, हाथी रोधी और जंगली सुअररोधी दीवार बनाने, चार बंदरबाड़े आदि की करीब 232 करोड़ रुपये की योजना तैयार की है।
रोजगार और सुरक्षा की दोहरी भूमिका
योजना का एक पहलू रोजगार का भी है। विपक्ष के लगातार बढ़ रहे हमले को देखते हुए प्रदेश सरकार की कोशिश है कि ग्राम स्तर पर रोजगार बढ़ाया जाए। इसी को चुनौती देते हुए उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी कहा था कि सरकार को यह पता ही नहीं है कि कैंपा में नौकरियां नहीं दी जा सकती हैं।