उत्तराखंड विधानसभा में अपनों को रेवड़ियों की तरह नियुक्तियां बांटी गई। नियुक्ति पाने वालों के प्रार्थना पत्र पर ही आदेश कर दिए गए। उत्तराखंड विधानसभा में भर्ती के लिए बनी नियमावली उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय सेवा (भर्ती तथा सेवा की शर्तें) नियमावली 2011 को दरकिनार कर नियुक्तियां की गई। भाकपा माले के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी ने कहा कि इस नियमावली में 2015 और 2016 में संशोधन भी हुआ, जिसमें कहीं नहीं लिखा है कि अध्यक्ष का विशेषाधिकार है कि वे जितनी और जैसे चाहे वैसी भर्तियां करें।
एक चिट्ठी में अभ्यर्थी ने विधानसभा अध्यक्ष को लिखा कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय की स्नातक और उत्तराखंड की मूल निवासी है। उन्हें उत्तराखंड की विधानसभा में शैक्षिक योग्यता के अनुसार किसी पद पर नियुक्ति दी जाए। चिट्ठी पर ही उन्हें सहायक समीक्षा अधिकारी पद पर नियुक्त करने के आदेश कर दिए गए।
एक अभ्यर्थी ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा कि वो गरीब परिवार का बेरोजगार युवक है, उन्होंने कंप्यूटर कोर्स किया है और शैक्षिक योग्यता स्नातक है। उन्हें सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि विधानसभा सचिवालय में पद खाली है। उनकी पारिवारिक स्थिति को देखते हुए उन्हें नियुक्ति दी जाए। इस पत्र पर अभ्यर्थी को विधानसभा में रक्षक पद पर तदर्थ नियुक्ति दे दी गई।
उत्तराखंड क्रांति दल ने विधान सभा में हुई नियुक्तियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले के आरोपियों को नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। दल के केंद्रीय मीडिया प्रभारी विजय बौड़ाई ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को कोई अधिकार नहीं है कि वह बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए कोई नियुक्ति प्रदान करें। उन्होंने कहा कि इस तरह की नियुक्तियां प्रदेश की जनता के साथ धोखा है। इस प्रकरण में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गलत दलील देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।