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उत्तराखंड संस्कृति यात्राः  देवभूमि की संस्कृ़ति में रचा बसा बुरांश, भगवान शिव सहित देवी-देवता खेलते हैं इसकी होली

Sun, 28 Mar 2021 12:48 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनय बहुगुणा, अमर उजाला, रुद्रप्रयाग

सार

  • फागुन में भगवान शिव सहित देवी-देवता खेलते हैं बुरांश की होली
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राज्य वृक्ष बुरांश - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तराखंड का राज्य वृक्ष बुरांश देवभूमि की लोक संस्कृति में रचा बसा है। इसे भगवान आशुतोष का प्रिय पुष्प भी माना जाता है। बुरांश की महत्ता को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित हैं।

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कहा जाता है कि फाल्गुन में भगवान शिव और सभी देवी-देवता बुरांश के फूलों से होली खेलते हैं। उत्तराखंड के लोकगीत, साहित्य और देवी भजनों में भी बुरांश का विशेष उल्लेख मिलता है। यही नहीं अब यह पुष्प गांवों में कई परिवारों की आर्थिकी का जरिया भी बन रहा है।
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मध्य हिमालय क्षेत्र में 1500 मीटर से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले बुरांश की 65 से अधिक प्रजातियां मध्य हिमालय में बताई जाती हैं। रुद्रप्रयाग जिले में मद्महेश्वर, तुंगनाथ, चोपता, देवरियाताल, मोहनखाल, घिमतोली और जखोली में लाल, गुलाबी, सफेद, पीला और नीले रंग का बुरांश सबसे अधिक खिलता है।

यह पुष्प सिर्फ बसंत के आगमन का ही नहीं, बल्कि प्रेम, उल्लास और यौवन का सूचक भी है। लोक गायकों, लेखकों और कवियों ने लोक गीतों, आलेखों और कविताओं में बुरांश की महिमा का बखान किया है।

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सुमित्रानंद पंत ने भी किया बुरांश का उल्लेख

छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने बुरांश के चटक रंग को अपने साहित्य में शामिल किया है। उन्होंने कुमाऊंनी में कविता लिखी... सार जंगल में त्वीं जस क्वें न्हॉरे क्वे न्हॉ, फूलन छे के बुरूंश जंगल जस जली जां। सल्ल छ, दयार छ, पई छ, अंयार छ, सबनाक फागन में पुग्रक भार छ, पे त्वी ज्वानिक फाग छ, रंगन में त्यार ल्वे छ, प्यारक खुमार छ।

अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा

राज्य वृक्ष बुरांश के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। पहाड़ में जंगलों के कटान से बुरांश भी अछूता नहीं है। पुराने जंगल सिमटने और नए पौधों के नहीं उगने से बुरांश सिमटने लगा है। बावजूद ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बुरांश के बीजों को एकत्रित कर पौधों को नर्सरी में तैयार कर इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।

समय से पहले खिल रहा बुरांश

बुरांश के खिलने के समय में परिवर्तन आया है। वसंत ऋतु के मध्य में खिलने वाला यह पुष्प फरवरी में ही खिल रहा है और करीब 20 दिनों से एक माह के अंतराल में खत्म भी हो रहा है, जो चिंता का विषय है।

बुंराश प्रकृति के यौवन को निखारने के साथ ही यह मानव जीवन के लिए बहुपयोगी है। चौड़ी पत्ती का यह वृक्ष, पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है। इसे संरक्षण व विकास के लिए आमजन से लेकर शासन, प्रशासन व विभाग को एकजुट प्रयास करने होंगे।
- जगत सिंह जंगली, पर्यावरणविद्, रुद्रप्रयाग
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