छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत ने बुरांश के चटक रंग को अपने साहित्य में शामिल किया है। उन्होंने कुमाऊंनी में कविता लिखी... सार जंगल में त्वीं जस क्वें न्हॉरे क्वे न्हॉ, फूलन छे के बुरूंश जंगल जस जली जां। सल्ल छ, दयार छ, पई छ, अंयार छ, सबनाक फागन में पुग्रक भार छ, पे त्वी ज्वानिक फाग छ, रंगन में त्यार ल्वे छ, प्यारक खुमार छ।
अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा
राज्य वृक्ष बुरांश के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। पहाड़ में जंगलों के कटान से बुरांश भी अछूता नहीं है। पुराने जंगल सिमटने और नए पौधों के नहीं उगने से बुरांश सिमटने लगा है। बावजूद ठोस प्रयास नहीं हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बुरांश के बीजों को एकत्रित कर पौधों को नर्सरी में तैयार कर इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।
समय से पहले खिल रहा बुरांश
बुरांश के खिलने के समय में परिवर्तन आया है। वसंत ऋतु के मध्य में खिलने वाला यह पुष्प फरवरी में ही खिल रहा है और करीब 20 दिनों से एक माह के अंतराल में खत्म भी हो रहा है, जो चिंता का विषय है।
बुंराश प्रकृति के यौवन को निखारने के साथ ही यह मानव जीवन के लिए बहुपयोगी है। चौड़ी पत्ती का यह वृक्ष, पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है। इसे संरक्षण व विकास के लिए आमजन से लेकर शासन, प्रशासन व विभाग को एकजुट प्रयास करने होंगे।
- जगत सिंह जंगली, पर्यावरणविद्, रुद्रप्रयाग