डिमरी धार्मिक पंचायत के अध्यक्ष आशुतोष डिमरी कहते हैं कि डिम्मर गांव की रामलीला का संबंध बदरीनाथ धाम से जुड़ा है। और यही वजह है कि यह आयोजन होली के दौरान होता है। बदरीनाथ भगवान विष्णु का धाम है और त्रेता युग में भगवान राम ही विष्णु के अवतार हुए।
कहा जाता है कि आठवीं सदी में जब आदिगुरु शंकराचार्य बदरीनाथ के प्रवास पर जा रहे थे तो उन्होंने डिम्मर गांव में एक स्थान को संध्या और वंदन के लिए चुना था, आज इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया है। तब संध्या के लिए उन्होंने मंदिर के नीचे कुंड से जल लिया था। यह कुंड आज भी यहां मौजूद है। कितना भी सूखा पड़ जाय, कुंड का पानी कभी कम नहीं होता। गांव की रामलीला भी इसी स्थान पर हो रही है।
आशुतोष डिमरी बताते हैं कि वर्ष 1918 में रामलीला की शुरूआत कराने में गांव के स्व. ज्ञानानंद डिमरी, धर्मानंद डिमरी, चक्रधर डिमरी, पीतांबर डिमरी, द्वारिका प्रसाद डिमरी आदि का अहम योगदान रहा था। उसके बाद 70 के दशक से रामलीला की शताब्दी तक स्व. कांता प्रसाद डिमरी के रावण के अभिनय ने छाप छोड़ी। गांव के उमा प्रसाद डिमरी, मोहन प्रसाद डिमरी आदि बुजुर्ग आज भी पूरे मनोयोग से रामलीला में पात्रों का उत्साहवर्धन करते आ रहे हैं।