प्रथम विश्व युद्ध में दरबान सिंह और गबर सिंह जैसे वीर सैनिकों ने जहां अपनी वीरता का परिचय दिया था वहीं द्वितीय राइफल गढ़वाल के हवलदार चंद्र सिंह भंडारी (गढ़वाली) ने वर्ष 1930 में पेशावर में निहत्थे देशभक्त पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर साम्राज्यवादी अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी थीं। इसी दिन उन्होंने अंग्रेजों को संदेश दे दिया था कि वे अब अधिक दिनों तक भारत पर अपना शासन नहीं कर सकेंगे।
पेशावर कांड के नायक वीर चंद्रसिंह गढ़वाली सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल थे। पठानों पर हिंदू सैनिकों की ओर से फायर करवाकर अंग्रेज भारत में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच फूट डालकर आजादी के आंदोलन को भटकाना चाहते थे, लेकिन वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने अंग्रेजों की इस चाल को न सिर्फ भांप लिया, बल्कि उस रणनीति को विफल कर वह इतिहास के महान नायक बन गए। संवाद
भरत नगर का सपना अभी भी अधूरा
पौड़ी जिले के रौणसेरागांव (पट्टी चौथान) में 25 दिसंबर, 1891 में जाथली सिंह भंडारी के घर जन्मे वीर चंद्रसिंह गढ़वाली आजादी के बाद कोटद्वार के ध्रुवपुर में रहने लगे थे। उन्होंने देश का नाम देने वाले राजा भरत के नाम से उर्तिछा में भरत नगर बसाने का सपना देखा था। पूरे शिवालिक क्षेत्र को मसूरी की तर्ज पर विकसित करने की उन्होंने योजना बनाई थी। लेकिन यह विडंबना ही है कि उनकी मृत्यु के बाद पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया। एक अक्तूबर, 1979 को दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया और उनका भारत नगर बनाने का सपना अधूरा रह गया।