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Uttarakhand: शिकारी पक्षियों को भी खूब भा रहा बाघों के लिए विख्यात कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, 30 प्रजातियां मिलीं

Mon, 08 Sep 2025 07:45 PM IST
अलका त्यागी विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

वन विभाग और डब्लूडब्लूएफ ने सीटीआर में शिकारी पक्षियों की जानकारी जुटाने के लिए सर्वे शुरू किया। इसके तहत पहले चरण का सर्वे करीब दो महीने पहले पूरा हुआ है।
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ईगल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बाघों के लिए विख्यात कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में शिकारी पक्षियों को भी खासा पसंद है। यहां पर एक-दो नहीं बल्कि 30 शिकारी पक्षियों की प्रजातियां हैं। यह जानकारी वन विभाग और डब्लूडब्लूएफ के सहयोग से शुरू हुए अध्ययन के दौरान हुए प्रारंभिक सर्वे में सामने आई है। वन विभाग और डब्लूडब्लूएफ ने सीटीआर में शिकारी पक्षियों की जानकारी जुटाने के लिए सर्वे शुरू किया। इसके तहत पहले चरण का सर्वे करीब दो महीने पहले पूरा हुआ है।

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इस सर्वे में आई जानकारी ने वन विभाग की खुशी को बढ़ा दिया है। इस सर्वे में कार्बेट टाइगर रिजर्व में शिकारी पक्षियों की 30 प्रजातियों का बसेरा होने का पता चला है। इसमें नौ प्रजातियों के घोंसले भी मिले हैं। इसमें पलाश ईगल फिश प्रजाति का घोंसला मिला है, जो बहुत कम जगह मिलता है।

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गिद्ध की सभी प्रजाति सीटीआर

कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला कह हैं कि गिद्ध संकटाग्रस्त है पर इसकी करीब सभी प्रजातियां सीटीआर में हैं। इसके अलावा नौ प्रजाति व घोंसले मिले हैं, जो बताता है कि ये पक्षी यहां पर ब्रीडिंग कर रहे हैं। कई संकटाग्रस्त प्रजातियां यहां पन उनके लिए जगह सुरक्षित है। अभी अध्ययन के दौरा एक सर्वे हो चुका है। जल्द ही दूसरा सर्वे किया जाएगा। इसमें प्रजातियों का विवरण, उनकी संख्या, किसके घोंसले हैं ये डिटेल एकत्र की जाएगी।

ये प्रजातियां मिलीं: 

जो सर्वे हुआ है, उसमें पांच संकटग्रस्त रेड हेडेड वल्चर, इंडियन स्पॉटेड ईगल, व्हाइट रम्प्ड वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, इंडियन वल्चर मिला है। इसके अलावा लेसर फिश ईगल, इजिप्शियन वल्चर व्हाइट रम्पड वल्चर, क्रेस्टेड सर्पेट ईगल, चेंजेबल हॉक ईगल आदि के घोंसले मिले हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. शाह बिलाल कहते हैं कि गिद्ध के प्रवास स्थल के प्रभावित होने और पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा के कारण संख्या में काफी कमी आई थी। इसके बाद पिंजौर में ब्रीडिंग सेंटर तक खोला गया था। सीटीआर में शिकारी पक्षियों की संख्या और घोंसला मिलना बेहतर और संरक्षित वास स्थल होने का भी संकेत है।
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