बद्री वन को विकसित करने के दो कारण हैं। एक बदरीनाथ धाम की धार्मिक मान्यताओं में पर्यावरण के मामलों को सबके सामने रखना और दूसरा इन वनस्पतियों का संरक्षण करना। चारों वनस्पतियों को एक ही स्थान पर दिखने से लोगों को जगह-जगह भटकना भी नहीं पड़ेगा।
- संजीव चतुर्वेदी, मुुख्य वन संरक्षक, वन अनुसंधान केंद्र
चारों वनस्पतियां:
बद्री वृक्ष (जुनिपरस मेक्रोपोडा) : इसके फलों और पत्तियों में एक अलग तरह की सुगंध होती है। इस सुगंध के कारण ही इसका उपयोग धूप बनाने में होता है। बौद्ध धर्म में भी इस पेड़ को पवित्र माना जाता है। कई रोगों के उपचार में भी यह काम आता है।
बद्री फल (हिपोपाई सालसीफोलिया) : 2000 से लेकर 3700 मीटर तक की ऊंचाई पर पाया जाने वाला यह छोटा पेड़ बेहद उपयोगी है। इससे उच्च गुणवत्ता का तेल बनता है, जिसका औषधीय उपयोग होता है। मान्यता है कि बद्रीनाथ में भगवान विष्णु इसी को खाया करते थे।
बद्री तुलसी (ओरिगेनम वलगेर) : यह तुलसी मुख्य रूप से बदरीनाथ और उसके आसपास के क्षेत्र में ही पाई जाती है। इसका उपयोग बद्री भगवान की पूजा में भी किया जाता है। अन्य तुलसियों की तुलना में यह तुलसी करीब 12 गुना अधिक कार्बन अवशोषित करती है।
भोज पत्र (बेतुला यूटिलिस) : कभी बदरीनाथ में भोजपत्र खासी संख्या में पाया जाता था। इस वृक्ष की छाल का उपयोग लिखने के लिए किया जाता था। पूर्व में पैदल यात्रा पर बदरीनाथ जाने वाले यात्री पांवों को घावों से बचाने के लिए भी इस पेड़ की छाल का इस्तेमाल करते थे।