मोदी मंत्रिमंडल का बहुप्रतीक्षित विस्तार हो गया। उत्तराखंड के हाथ खाली रह गए। कम से कम एक मंत्री और बनाए जाने की उत्तराखंड अपेक्षा कर रहा था। खास तौर पर तब, जबकि देश के शीर्ष पदों पर उत्तराखंड के लोग चमक रहे हैं।
जिस राज्य ने अपने पांचों सांसद बीजेपी को दिए। 70 सदस्यों वाली विधानसभा में 57 विधायक बीजेपी के पहुंचा दिए हो, वहां पर अवाम की एक और मंत्री की अपेक्षा को कोई गैरवाजिब नहीं मान रहा था। इन स्थितियों के बीच, बीजेपी पर अब विरोधियों के हमले और बढ़ने तय है।
उत्तराखंड बीजेपी के पास रक्षात्मक होने के अलावा और कोई चारा नहीं है। हालांकि पार्टी दावा कर रही है कि कुछ ही महीनों में केंद्र सरकार ने विभिन्न प्रोजेक्टों में उत्तराखंड के लिए करीब 50 हजार करोड़ का बजट मंजूर कर दिया है। इसके बावजूद, केंद्रीय मंत्रिमंडल में उत्तराखंड की उपेक्षा का सवाल बड़ा बन रहा है।
बीजेपी की घेराबंदी कर रहे विरोधियों का सीधा सवाल ये है कि उत्तराखंड में चुनाव निबट गए, तो क्या यहां से मुंह मोड़ लिया जाएगा। दरअसल, इससे पहले भी हाईकमान के उपेक्षित रवैये से उत्तराखंड बीजेपी को काफी दिक्कतें झेलनी पड़ी।
2014 के लोकसभा चुनाव में पांचों सांसद बीजेपी से जीतने के बावजूद बहुत देर में मोदी कैबिनेट में उत्तराखंड की एंट्री हुई। तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के दावे को दर किनार किया गया और अपेक्षाकृत जूनियर अजय टम्टा को राज्य मंत्री बनाया गया।
इन स्थितियों के बीच, इस बार हालांकि उत्तराखंड का मंत्रिमंडल के लिए दावा बहुत दमदार नहीं था, लेकिन फिर भी संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा रहा था। चार सांसदों में से यदि किसी के मंत्री बनने की सबसे ज्यादा उम्मीद प्रकट की जा रही थी, तो वह पूर्व सीएम डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक थे।
उम्रदराज होने के कारण पूर्व सीएम बीसी खंडूरी और भगत सिंह कोश्यारी को पहले ही रेस से बाहर माना जा रहा था। टिहरी सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह के नाम की खास चर्चा नहीं थी। बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव तीरथ सिंह रावत का मानना है कि मंत्रिमंडल विस्तार में उत्तराखंड को स्थान न मिलने को उपेक्षा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। केंद्र सरकार का पूरा ध्यान उत्तराखंड पर है। आने वाले समय में इसके नतीजे दिखाई देंगे।