खेती बंद, लहलहा रही वीरानगी की फसल
मलान, मितड़ा गांव फल उत्पादन की दृष्टि से उपयुक्त हैं। इन गांवों में आम, अमरूद, लीची, केले की अच्छी पैदावार होती है। जब लोग बेरोजगार थे तो सड़क नहीं होने से फल बाजार तक नहीं पहुंच पाते थे। अब सड़क पहुंची तो फलों की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। पहले धान, गेहूं, मडुवा, उड़द, गहत, मसूर, मटर और सब्जियों की खूब खेती होती थी लेकिन पलायन होने से यह सब बंद हो
गया। खेती करने वाला कोई बचा ही नहीं। जो बुजुर्ग हैं, उनके बस की बात नहीं कि वे जंगली जानवरों से अपने खेती को बचा सकें, इसलिए वह खेती करते ही नहीं हैं। अब दोनों ही गांवों में वीरानगी की फसल लहलहा रही है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था मलान
मलान गांव समय पर सड़क सुविधा नहीं मिलने से वीरान सा हो गया है। यह कभी कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था। 1960 से पहले काठगोदाम और टनकपुर से जो कैलाश यात्री आते थे वे पिथौरागढ़-सतगढ़-मलान-अस्कोट होते हुए पैदल तिब्बत जाते थे। उस समय कई यात्री यहां ठहरते थे। इसी रास्ते से अस्कोट के पाल राजा लाव-लश्कर के साथ घोड़े पर सवार होकर अल्मोड़ा के लिए निकलते थे। मलान में दुकानें थीं तो यहां चहल-पहल रहा करती थी।
क्षेत्र का सबसे पुराना पोस्ट ऑफिस भी मलान में था। गुड़ौली सहित अन्य गांव जो अब नेशनल हाईवे से जुड़ने के कारण सुविधा संपन्न माने जाते है, पूर्व में वहां के लोग खरीदारी, पोस्ट ऑफिस आदि के काम से मलान आते थे। अब मलान के बाजार में केवल एक छोटी सी दुकान है, जिसमें पूरे दिन गिने-चुने ग्राहक ही आते हैं।