उत्तराखंड में लोकसभा चुनावों के परिणाम के साथ ही जमानत जब्त होने का एक अनोखा रिकॉर्ड बन गया है। दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर कोई भी अपनी जमानत नहीं बचा पाया।
उत्तराखंड में वैसे तो कांग्रेस और भाजपा के बीच ही रस्साकसी होती रही है पर अलग-अलग सीटों पर तीसरी ताकत कोई न कोई मौजूद रहती आई है।
2014 के लोक सभा चुनाव में मतदाताओं ने सिर्फ कांग्रेस-भाजपा को ही सामने रखा। हाल यह है कि प्रदेश में कुल मिलाकर 74 प्रत्याशी मैदान में थे जिनमें से 64 को अपनी जमानत तक गंवानी पड़ी।
जमानत बचाने के लिए जरूरी कुल वैध मतों का छठवां हिस्सा तक कोई दल या प्रत्याशी नहीं ले पाया।
किसी भी दल की नहीं बची जमानत
प्रदेश की पांचों संसदीय सीटों पर मतदाताओं ने न तो आप को सुना, न बसपा को, न सपा को और न ही किसी अन्य दल या प्रत्याशी को।
हाल यह रहा कि सभी सीटों पर कांग्रेस-भाजपा को छोड़कर अन्य सभी दलों और प्रत्याशियों को दस हजार वोट जुटाना तक भारी पड़ा है।
हरिद्वार और नैनीताल में बसपा जरूर पांच प्रतिशत वोट ले पाई पर यह भी जमानत बचाने के लिए काफी नहीं रहा।
80 हजार वोट और जमानत जब्त
नैनीताल सीट पर किसी भी प्रत्याशी के लिए जमानत बचाने के लिए कम से कम 1.83 लाख वोट चाहिए थे जबकि बसपा यहां साठ हजार पर ही सिमट गई।
2009 में इसी सीट से बसपा करीब 15 प्रतिशत वोट ले गई थी। इसी तरह हरिद्वार में बसपा 80 हजार से अधिक वोट पाने में कामयाब रही पर जमानत यहां भी नहीं बचा पाई।
इसके अलावा अन्य सभी सीटों पर बसपा सहित अन्य दलों का मतप्रतिशत बेहद कम रहा। जाहिर है कि मतदाताओं ने केवल भाजपा और कांग्रेस को सामने रखकर ही वोट दिए।
क्यों होती है जमानत जब्त?
चुनाव लड़ने के लिए नामांकन करते समय प्रत्याशी को धरोहर राशि जमा करानी होती है। चुनाव में कुल वैध मत का 1/6 हिस्सा वोट पाने पर ही धरोहर राशि वापस की जाती है। अन्यथा यह जमानत राशि जब्त कर ली जाती है।
अगर किसी सीट पर कुल छह लाख वैध मत हैं तो एक लाख से कम वोट पाने वालों की जमानत राशि जब्त होगी।