मां उसके ठीक होने की दिनभर दुआएं करती रही। उन्हें नहीं पता था कि वह बेटा अब कभी नहीं आएगा। शाम को करीब आठ बजे मेजर विभूति की पत्नी और मामा घर पहुंचे। इसके बाद उन्होंने शहादत की खबर बताई तो पूरे घर में कोहराम मच गया।
बहन के नहीं निकल रहे आंसू
मेजर विभूति की एक बहन शाम को पार्थिव शरीर के पास आकर खड़ी हो गई। उसी आंखों में एक सवाल था। वह ताबूत में अपने भाई का शरीर मानने को तैयार नहीं थी। आसपास खड़े रिश्तेदारों ने समझाया। बहन ने ताबूत को हाथ से छुआ लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह गहरे सदमे में है। रो नहीं पा रही है।