दिग्गजों की चुनावी पराजयों का इतिहास यहीं नहीं थमा है। हरिद्वार लोस सीट पर 1989 और 1991 में मायावती बसपा के टिकट पर दो बार चुनाव हार गईं। बसपा सुप्रीमो की 1991 के चुनाव में तो जमानत तक जब्त हो गई थी। उन्हें महज चार फीसदी वोट ही नसीब हुए। 1989 के चुनाव में जरूर उन्हें 22.63 फीसदी वोट मिले थे। गढ़वाल लोस सीट चार बार सांसद रहे मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी को भी 1996 और 2009 के लोस चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। गढ़वाल सीट पर 1989 में सतपाल महाराज भी जनता दल के चंद्रमोहन सिंह नेगी से चुनाव हारे थे।
ये दिग्गज भी हारे चुनाव
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रणेता इंद्रमणि बडोनी भी टिहरी लोस सीट से चुनाव हारे। 1989 में उन्हें कांग्रेस के ब्रह्म दत्त ने हराया। बडोनी निर्दलीय चुनाव लड़े थे और उन्हें 35.08 प्रतिशत वोट मिले थे। जबकि ब्रह्म दत्त को 38.04 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। 1999 के लोस चुनाव में कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को उतारा था। बहुगुणा भाजपा के मानवेंद्र शाह से चुनाव हार गए थे। इसी चुनाव में मुन्ना सिंह चौहान समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन वह जमानत भी नहीं बचा सके। 1998 के चुनाव में टिहरी सीट पर मुन्ना सिंह चौहान और नव प्रभात की जमानत जब्त हो गई थी। मुन्ना सपा और नव प्रभात बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। इसी चुनाव में कांग्रेस ने हीरा सिंह बिष्ट को उम्मीदवार बनाया था और उन्हें भी भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा था।