उनका पौत्र भी बेहद छोटा है, जिस कारण उससे दादा के अंतिम संस्कार की क्रियाएं नहीं कराई जा सकी। उनके सगे संबंधी टिहरी, उत्तरकाशी व अन्य जिले में रहते हैं। लॉकडाउन की सख्ती के कारण उन्हें भी आने की अनुमति नहीं मिल सकी। ऐसे में उन्होंने कुल पुरोहित के रूप में उनकी अंतिम क्रियाएं की।
आचार्य विजेंद्र ने कहा कि इस तरह के कई मामले सामने आ रहे हैं। ऐसी स्थिति में कुल पुरोहित से भी अंतिम क्रियाएं कराई जा सकती हैं। इसका शास्त्रों में भी उल्लेख है, लेकिन इसमें पुरोहित को मुंडन संस्कार करना अनिवार्य नहीं है। बाद में पुत्र या परिवार के सदस्य उसी तिथि पर आत्म संतुष्टि के लिए पार्वण श्राद्ध, तीर्थ श्राद्ध आदि कर सकते हैं।