कोर्ट ने कहा कि कोरोना महामारी में भी तेलंगाना की जेलों ने बहुत अच्छा कार्य किया है और फर्श साफ करने वाले क्लीनर के साथ सेनिटाइजर्स और मास्क का उत्पादन कर खतरनाक महामारी में देश का सहयोग किया है। कोर्ट ने कहा कि चंपावत की एक जेल की छोटी (छह बाई छह) की कोठरी में आठ महिला कैदियों को जानवरों की तरह से ठूंसा गया है। उनका खाना बाथरूम में बनाया जा रहा है।
कोर्ट ने पिथौरागढ़ की सात करोड़ रुपये की लागत से तैयार की गई जेल की दीवार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जेल कर्मियों के क्वार्टर से अधिक जरूरी बंदियों की बैरकों का निर्माण है। कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास न तो जेलों के सुधार का कोई विजन है और न ही इच्छाशक्ति। कोर्ट ने कहा कि हैदराबाद के चेरापल्ली जेल में आज बंदियों का पूरा खाना आधुनिक मशीनों से तैयार किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि जेलों में भीड़ को कम करने के लिए एक जेल से दूसरे जेल में बंदियों को स्थानांतरित किया जा रहा है।
कोर्ट ने कहा कि पौड़ी, टिहरी, चमोली एवं उत्तरकाशी जनपद की जेलों से कैदियों को हरद्विर और देहरादून की जेलों में शिफ्ट कर दिया जा रहा है। इसी प्रकार पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और नैनीताल जनपदों से भी भीड़ कम करने के लिए बंदियों को हल्द्वानी या सितारगंज केंद्रीय जेल में भेजा जा रहा है। कोर्ट ने इसे कैदियों और उनके परिजनों के मौलिक अधिकारों का हनन बताया और कहा कि कैदी हमारे समाज का हिस्सा हैं और सरकार कैदियों के सुधार के लिए कुछ नहीं कर रही है।
कोर्ट ने जेल महानिरीक्षक दीपक ज्योति घिल्डियाल को निर्देश दिए कि वह 7 दिसंबर तक प्रदेश की सभी जेलों का दौरा कर जेलों की वर्तमान स्थिति, जेलों एवं कैदियों के सुधार के लिए उपयुक्त कदमों के साथ ही प्रदेश में ओपन जेल की अवधारणा एवं जेल प्रशासन के ढांचे में सुधार के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इस संबंध में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 8 दिसंबर की तिथि नियत की है।