नैनीताल हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं को आदेश दिए हैं कि वे याचिका के साथ गजट नोटिफकेशन, शासकीय गजट, एक्ट और कोर्ट के आदेश की फोटो प्रति संलग्न न करें। कोर्ट ने कहा है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के तहत उक्त मान्य साक्ष्य हैं और यदि ये नेट पर उपलब्ध हैं तो उन्हें याचिका के साथ संलग्न करने की जरूरत नहीं है क्योंकि इससे वादकारियों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ तो पड़ता ही है साथ ही अत्यधिक कागज के प्रयोग से पर्यावरण को भी नुकसान होता है। साथ ही ये याचिकाएं अंतत: कूड़े का ढेर बन जाती हैं।
वन विभाग के एक रिटायर कर्मचारी की ओर से पेंशन और अन्य लाभ के लिए करीब ढाई सौ से अधिक पेजों की याचिका दाखिल करने पर न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने यह आदेश जारी किया है।
हाईकोर्ट ने कागज के साथ ही स्याही के उपयोग को भी कम करने को कहा है। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री कार्यालय को निर्देश दिए हैं कि इस आदेश की प्रति बार काउंसिल, बार एसोसिएशन को भेजकर अधिवक्ताओं से इस आदेश का पालन करने को कहें। कोर्ट ने मुख्य स्थायी अधिवक्ता कार्यालय से याचिकाकर्ता से दो ही प्रतियों में याचिका प्राप्त करने को कहा है।
न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि याचिका में गजट, जीओ, रेगुलेशन, सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट आदि के पूर्व आदेशों को याचिका में संलग्न करने की जरूरत नहीं थी। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 48 ए का भी जिक्र किया, जिसमें जल, जंगल, जमीन व वन्य जीव संरक्षण को सरकार की जिम्मेदारी बताया गया है। वहीं कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 51 ए (जी) के तहत पर्यावरण संरक्षण नागरिकों का कर्तव्य है।
कोर्ट ने कहा है कि कागज वन उत्पाद है और जितना अधिक कागज प्रयोग होगा, उतने ही पेड़ कटेंगे। पेड़ काटने से वन व नदियां खतरे में हो जाती हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का भी जिक्र किया, जिसमें रिट याचिका ए-4 साइज कागज में और दोनों ओर प्रिंट कर दायर करने को कहा गया है।