बता दें कि याची जसवीर का कहना था कि एनआईटी को हाइवे के किनारे स्थापित किया गया है। इससे कई छात्र तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आ रहे हैं। संस्थान का अपना परिसर नहीं है और सरकार की उपेक्षा का ही सबब है कि संस्थान में पंजीकृत छात्र-छात्राओं को जयपुर एनआईटी में प्रशिक्षण लेना पड़ रहा है।
पूर्व में इसी मामले में श्रीनगर के सुमाड़ी, नियाल सहित अन्य गांवों के लोगों ने पक्षकार बनाए जाने की मांग की थी। इनका कहना था कि संस्थान के लिए उन्होंने अपनी जमीन दान में दी और अब सरकार इस संस्थान को मैदान में ले जाने का प्रयास कर रही है। इसी पर पूर्व में कोर्ट ने कहा था कि सरकार का यही हाल रहा तो यह संस्थान उत्तराखंड के हाथ से निकल जाएगा।
एनआईटी कैंपस में नहीं होगा बदलाव
प्रदेश सरकार नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) कैंपस पहाड़ से उतारने के लिए सहमत नहीं है। सरकार ने श्रीनगर के पास सुमाड़ी में प्रस्तावित स्थल का कंटूर सर्वेक्षण कर डेढ़ सौ एकड़ भूमि को भवन निर्माण के लिए उपयुक्त पाया है।
चिह्नित भूमि के जिस हिस्से को निर्माण योग्य नहीं पाया गया, वहां पौधरोपण और सुंदरीकरण का कार्य किया जाएगा। इसके अलावा संस्थान को रेशम विभाग की भूमि भी आवंटित कर दी गई है। सरकार हाईकोर्ट में सर्वेक्षण रिपोर्ट के साथ भूमि और निर्माण संबंधित अन्य दस्तावेज दाखिल करेगी।
एनआईटी कैंपस को लेकर चल रहा विवाद हाईकोर्ट में विचाराधीन है। बीते वर्ष एक छात्रा के नेशनल हाईवे पार करते समय सड़क हादसे की चपेट में आने के बाद संस्थान के नौ सौ स्टूडेंट ने कैंपस शिफ्ट करने को लेकर आंदोलन चलाया था। छात्रों ने मौजूदा पॉलीटेक्निक और आईटीआई परिसर में संचालित हो रहीं क्लासेज का विरोध जताया। एक साथ सभी छात्रों के कैंपस छोड़ने पर मामला मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक पहुंच गया।
एचआरडी ने दिसंबर में प्रथम, द्वितीय और तीसरे वर्ष के लगभग छह सौ छात्रों को जयपुर एनआईटी कैंपस में शिफ्ट कर दिया, जबकि चतुर्थ वर्ष और स्नातकोतर छात्रों को श्रीनगर कैंपस में ही रखा गया। इसके बाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई, जिसपर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश के अनुसार कंटूर सर्वेक्षण की प्रारंभिक रिपोर्ट और भूमि संबंधित रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी जाएगी।