इस कारण उपभोक्ता अपने को ठगा सा महसूस करता है। याचिका में कहा कि अगर उपभोक्ता प्रोडक्ट सही नहीं होने पर उसके खिलाफ उपभोक्ता फोरम में शिकायत करना भी चाहता है तो वह भी नहीं कर सकता है, क्योंकि उसे कंपनी के नाम तक का पता ही नहीं होता है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव बिष्ट का कहना था कि इस संबंध में केंद्र सरकार ने 2011 में लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट बनाया था। 2018 में इस एक्ट को संशोधित भी किया था। इसमें कहा गया कि ऑनलाइन शॉपिंग कराने वाली कंपनियां प्रोडक्ट के साथ उसकी निर्मित अवधि, निर्मित क्षेत्र, संबंधित देश से जुड़ी सभी जानकारियां प्रोडक्ट के साथ देंगीं, लेकिन ये कंपनियां प्रोडक्ट से जुड़ी कोई जानकारी नहीं देती हैं।
याचिकाकर्ता का कहना था कि ऑनलाइन शॉपिंग कराने वाली कंपनियां प्रोडक्ट के साथ उससे जुड़ी सभी जानकारियां उपलब्ध कराएं। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिका को निरस्त करते हुए कहा है कि याचिकाकर्ता चाहे तो अपनी शिकायत केंद्र सरकार को दर्ज करा सकते हैं।