- प्रदेश के निकायों में हर दिन 900 टन कूड़ा उत्पन्न होता है। इसमें करीब 50 प्रतिशत आर्गेनिक वेस्ट है। 17 प्रतिशत ऐसा कूड़ा है, जिसे रिसाइकिल किया जा सकता है। 11 प्रतिशत बायोमेडिकल वेस्ट है और 21 प्रतिशत इनर्ट (रेत, कंक्रीट आदि) कूड़ा है।
- 40 प्रतिशत कूड़ा हमारे यहां ऐसा है, जिसे उठाया ही नहीं जाता। यह कूड़ा सड़कों, नालों और अन्य स्थानों पर डंप होता है।
- इस कचरे से 5 मेगावाट तक बिजली पैदा की जा सकती है, यह आंकलन राज्य प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरण संरक्षण बोर्ड का है।
- 24 मेगावाट बायोमास बिजली उत्पादन की क्षमता है प्रदेश में। यह बायोमास औद्योगिक और कृषि के कचरे से उत्पन्न होता है। कुल कचरे का यह करीब 50 प्रतिशत है। पहाड़ों में इसी कचरे के उपयोग से बिजली बनाने पर विचार किया जा रहा है।
किस तरह बनती है बिजली
- इसमें इन्सीनरेटर के जरिये कूड़ा जलाया जाता है और उससे पैदा होने वाली गर्मी से टरबाइन चलाकर बिजली पैदा की जाती है। एक लैंडफिल से मीथेन गैस को लाकर उसे जलाकर भी बिजली पैदा की जा सकती है।
वेस्ट टू एनर्जी के लिए सरकार को कचरे को एकत्र कर, उसे छांटने और इस कचरे को प्लांट तक लाने की व्यवस्था करनी होगी। मैदानी इलाकों में यह व्यवस्था करना आसान है, और यही वजह है कि सरकार पहले इस काम को मैदानी जिलों से शुरू करना चाहती है। बता दें कि स्टेट एन्वायरमेंट रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में करीब 221 मीलियन यूनिट बिजली की कमी है। एक टन कचरे से 600 किलोवाट तक बिजली पैदा हो सकती है।
वेस्ट टू एनर्जी को प्रदेश में लागू करने का फैसला किया गया है। जल्द ही सीएम की अध्यक्षता में इसको लेकर बैठक होगी। इससे एक तरफ कचरे की समस्या से निजात मिलेगी तो वहीं दूसरी तरफ बिजली की कमी भी दूर होगी। रुड़की के प्लांट को लेकर भी जल्द ही कोई निर्णय होगा। पहले हमारे पास नीति नहीं थी, अब नीति बना ली गई है।
-मदन कौशिक, शहरी विकास मंत्री