इस संबंध में निजी शिक्षण संस्थानों के संगठन की ओर से शासन को प्रत्यावेदन दिया गया है। सूत्रों की मानें तो कतिपय नेताओं की ओर से भी निजी संस्थानों के पक्ष में पैरोकारी हो रही है। यही कारण है कि शासन स्तर पर निजी संस्थानों की मांग पर गंभीरता से विचार हो रहा है। चूंकि शासनादेश को पलटा जाना है, इसलिए प्रस्ताव मंत्रिमंडल तक जाएगा। आधिकारिक सूत्रों की मानें तो विभागीय स्तर पर कैबिनेट नोट तैयार हो रहा है और आने वाले मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी के लिए रखा जाएगा।
सरकारी प्रवेश शुल्क के संबंध में निजी शिक्षण संस्थानों की ओर से प्रत्यावेदन दिया गया है। अभी इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। प्रस्ताव अभी विचाराधीन है। - डॉ. रणवीर सिंह, अपर मुख्य सचिव, समाज कल्याण
ये होती है प्रवेश व ट्यूशन फीस व्यवस्था
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के गरीब छात्रों को निजी शिक्षण संस्थानों में सरकारी दरों पर दाखिला मिलता है, जबकि सामान्य छात्रों से संस्थान अपनी निर्धारित दरों पर शुल्क वसूलते हैं। बाद में सरकार छात्रों के खाते में शुल्क की प्रतिपूर्ति कर देती है। सरकार ने ये प्रावधान इसलिए किया था कि निजी शिक्षण संस्थानों की अपनी दरों के स्थान पर सरकारी दरों पर शुल्क निर्धारण से गरीब दलित छात्र के लिए उच्च और व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने में आसानी होगी।
इसलिए बदलाव चाहते हैं शिक्षण संस्थान
लेकिन शुल्क की सरकारी दरों से निजी शिक्षण संस्थानों को फायदा नहीं हो रहा है। वे संस्थान के संचालन और अवस्थापना पर आ रहे खर्च के हिसाब से शुल्क का निर्धारण चाहते हैं। इसलिए वे शासन से सरकारी दरों पर शुल्क निर्धारण की शर्त में बदलाव की मांग कर रहे हैं।