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प्राइवेट कॉलेजों ने बढ़ाई एससी-एसटी छात्रों की परेशानी, अब सरकार लेने जा रही बड़ा फैसला

Tue, 06 Nov 2018 05:00 AM IST
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
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प्रदेश के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के छात्रों के अध्ययन के लिए निजी शिक्षण एवं व्यावसायिक संस्थानों में सरकार की ओर से तय की गई फीस की दरों का फैसला पलटने की तैयारी है। प्रदेश सरकार ऐसा निजी शिक्षण संस्थानों के दबाव में करने जा रही है। सरकारी दरों पर दाखिला व ट्यूशन फीस से निजी शिक्षण संस्थानों को लाभ नहीं हो रहा है। 

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इसलिए शिक्षण संस्थानों ने सरकार को साफ कर दिया है कि उन्हें अपने हिसाब से शुल्क निर्धारण की इजाजत नहीं दी गई तो वे आगे से प्रवेश नहीं दे पाएंगे। अब समाज कल्याण विभाग के उस शासनादेश में संशोधन पर विचार हो रहा है, जिसमें सरकारी दरों पर शुल्क वसूली का प्रावधान है। आधिकारिक सूत्रों की मानें तो शासनादेश में संशोधन का प्रस्ताव प्रदेश मंत्रिमंडल की बैठक में भी लाया जाएगा।

दशमोत्तर छात्रवृत्ति योजना में घोटाला उजागर होने के बाद निजी शिक्षण संस्थानों की मनमानी पर अंकुश लगाने के लिए शासन ने कई संशोधन किए थे। वर्ष 2014 में तत्कालीन सचिव (समाज कल्याण) ने शासनादेश किया था, जिसमें निजी शिक्षण एवं व्यावसायिक संस्थानों में प्रवेश लेने वाले अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग के छात्रों की फीस की सरकारी दर तय की गई थी। प्रवेश के वक्त छात्र-छात्रा सरकार की ओर से तय फीस ही संस्थान में जमा करते हैं।
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बाद में सरकार की ओर से फीस की राशि संबंधित छात्र-छात्रा के खाते में सरकार की ओर से भेज दी जाती थी। इस शासनादेश से कई नामी निजी शिक्षण संस्थान असहज हैं और उन्हें सरकारी दरों पर फीस घाटे का सौदा लग रही है। निजी शिक्षण संस्थान चाहते हैं कि सरकार शासनादेश में संशोधन करे और संस्थान को अपने हिसाब से शुल्क निर्धारण की अनुमति दी जाए।

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इस संबंध में निजी शिक्षण संस्थानों के संगठन की ओर से शासन को प्रत्यावेदन दिया गया है। सूत्रों की मानें तो कतिपय नेताओं की ओर से भी निजी संस्थानों के पक्ष में पैरोकारी हो रही है। यही कारण है कि शासन स्तर पर निजी संस्थानों की मांग पर गंभीरता से विचार हो रहा है। चूंकि शासनादेश को पलटा जाना है, इसलिए प्रस्ताव मंत्रिमंडल तक जाएगा। आधिकारिक सूत्रों की मानें तो विभागीय स्तर पर कैबिनेट नोट तैयार हो रहा है और आने वाले मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी के लिए रखा जाएगा।

सरकारी प्रवेश शुल्क के संबंध में निजी शिक्षण संस्थानों की ओर से प्रत्यावेदन दिया गया है। अभी इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। प्रस्ताव अभी विचाराधीन है। - डॉ. रणवीर सिंह, अपर मुख्य सचिव, समाज कल्याण

ये होती है प्रवेश व ट्यूशन फीस व्यवस्था
अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के गरीब छात्रों को निजी शिक्षण संस्थानों में सरकारी दरों पर दाखिला मिलता है, जबकि सामान्य छात्रों से संस्थान अपनी निर्धारित दरों पर शुल्क वसूलते हैं। बाद में सरकार छात्रों के खाते में शुल्क की प्रतिपूर्ति कर देती है। सरकार ने ये प्रावधान इसलिए किया था कि निजी शिक्षण संस्थानों की अपनी दरों के स्थान पर सरकारी दरों पर शुल्क निर्धारण से गरीब दलित छात्र के लिए उच्च और व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करने में आसानी होगी।

इसलिए बदलाव चाहते हैं शिक्षण संस्थान
लेकिन शुल्क की सरकारी दरों से निजी शिक्षण संस्थानों को फायदा नहीं हो रहा है। वे संस्थान के संचालन और अवस्थापना पर आ रहे खर्च के हिसाब से शुल्क का निर्धारण चाहते हैं। इसलिए वे शासन से सरकारी दरों पर शुल्क निर्धारण की शर्त में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
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