फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बदरीनाथ हाईवे पर सरकार की गाड़ी 'पंचर'

Mon, 22 Sep 2014 06:06 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रभु बदरीनाथ संसारी जनों की उलझनें तो सुलझाते रहते हैं लेकिन अब उन्हें सरकारी जनों की उलझनें भी सुलझानी होंगी, तभी उन तक पहुंचने का रास्ता बन पाएगा और उनके भक्त उनके दर पर आकर उनकी जय जयकार कर सकेंगे।
विज्ञापन


बदरीनाथ हाईवे केंद्र, राज्य, बीआरओ, पीडब्ल्यूडी...और कई दृश्य-अदृश्य शक्तियों के बीच उलझ गया है। इसकी बुरी हालत की सभी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर बच ले रहे हैं। किसी को भी बदरीनाथ का लिहाज नहीं। पिछले साल जून में आई आपदा तो गुजर गई लेकिन उससे बड़ी आपदा उसके बाद आई हुई है-सरकारी सुस्ती की।

चारधाम यात्रा आनन-फानन शुरू करवाने चक्कर में सरकार ने पानी निकासी का इंतजाम किए बिना ही बुरी तरह ध्वस्त हाईवे की कामचलाऊ मरम्मत करा दी थी जो फिर से तबाह है। ढोल पीट-पीटकर देश-दुनिया से लोगों को (सुरक्षित) उत्तराखंड बुलाने वाली मशीनरी सभी धामों में सबसे सुगम बदरीनाथ के लिए ही सवा साल बाद भी आवाजाही लायक रास्ता नहीं बना सकी है। बाकी दुर्गम धामों के लिए तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती।
विज्ञापन


हाईवे का हाल, एक नजर में
-बदरीनाथ राजमार्ग पर जोशीमठ से कंचनगंगा तक 54 किलोमीटर हिस्सा खतरनाक बना हुआ है।
-जोशीमठ से आगे धाम की ओर लामबगड़ से बैनाकुली के बीच हाईवे का तीन किमी हिस्सा बेहद जर्जर।
-चमोली जिले में हेलंग, पीपलकोटी, गडोरा, पाताल गंगा, पागल नाला, मैठाणा में भी मार्ग बंद होता रहा।
-श्रीनगर-रुद्रप्रयाग के बीच सिरोहबगड़ में पहाड़ी से मलबा आने के चलते मार्ग अक्सर बंद हो जाता है।
-टिहरी जिले में भी कई जगह मार्ग खस्ताहाल। 15 अगस्त को यहां सड़क का बड़ा हिस्सा बह गया था।

धाम में भक्ति भाव की जगह फैला है आक्रोश

चारधामों में सबसे महत्वपूर्ण बदरीनाथ धाम में इन दिनों भक्ति-भाव से ज्यादा रोष का वातावरण है। साधु-संत और तीर्थ-पुरोहित मंत्रोच्चारण की जगह जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं। धाम में हाईवे को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया है। कारोबार की जगह व्यापारी धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। होटल-ढाबे वाले खान-पान छोड़ अनशन की तैयारी में जुटे हैं।

इन सभी वर्गों के सब्र का बांध टूटने की बड़ी ठोस वजह है। साल भर से ज्यादा हो गया लेकिन बदरीनाथ हाईवे की हालत नहीं सुधरी। आपदा के कारण पहले से ही तीर्थयात्रियों में फैला डर, रही-सही कसर आवाजाही आसान न होने ने कर दी। पिछले साल जून में जलप्रलय से पहले जहां रोज हजारों यात्री आते थे, इस बार ये 200-300 ही रह गए।

जलप्रलय के बाद ध्वस्त हाईवे के पुनर्निर्माण की सरकारी घोषणाएं की गईं लेकिन की गई कामचलाऊ मरम्मत। हल्की बारिश होते ही भूस्खलन से हाईवे जगह-जगह बंद होता रहा। ऐसे में यात्रियों के बार-बार फंसने की खबरें देश भर के यात्रियों को यहां न आने का अप्रत्यक्ष संदेश देती रही।

10 अगस्त से धाम में चल रहा है आंदोलन

हाईवे की हालत ठीक होती तो ऐसा न होता, यह मानकर बदरीधाम और आसपास के लोग, कारोबारी, तीर्थपुरोहित और साधु-संत व माणा और बामणी गांव के ग्रामीण पिछले 10 अगस्त से आंदोलन कर रहे हैं। राज्य और केंद्र दोनों सरकारों के साथ सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के प्रति भी उनमें जबरदस्त नाराजगी है।

डर भी  है कि सिस्टम की काहिली का आलम यही रहा तो हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर अगले यात्रा सीजन में भी संकट बना रहेगा। बदरीनाथ धाम से लेकर जोशीमठ के आसपास के क्षेत्र की बड़ी आबादी यात्रा पर आश्रित है। तीर्थपुरोहित से लेकर होटल व्यवसायी और फूलवाले तक इसी क्षेत्र में हैं। इनकी ओर से बनाई गई आपदा संघर्ष समिति ने हाईवे की सुधार का काम शुरू न होने पर 20 सितंबर से क्रमिक अनशन को आमरण अनशन में बदल दिया है।

तीन माह में 227 घंटे बंद रहा हाईवे
इस बार जून से अगस्त माह तक करीब 227 घंटे बदरीनाथ राजमार्ग चमोली जिले में जगह-जगह  बाधित  रहा।

सामरिक लिहाज से भी महत्वपूर्ण
बदरीनाथ हाईवे सामरिक लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। यह सड़क भारत-चीन सीमा को भी जोड़ती है। सीमा पर मुस्तैद भारतीय सेना की रसद और आवश्यक वस्तुएं इसी हाईवे से सप्लाई होती हैं।
विज्ञापन

मौसम की मेहरबानी पर निर्भर

अगले वर्ष बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले सड़क निर्माण के लिए अधिक समय नहीं रहेगा। दिसंबर से फरवरी तक मौसम सड़क निर्माण के अनुकूल नहीं होता। ऐसे में मिला-जुलाकर चार से पांच माह का समय ही निर्माण एजेंसियों को मिल पाएगा। यात्रा मई से अक्तूबर माह तक चलती है।

अगला सीजन भी हो सकता है भारी
बदरीनाथ सहित अन्य राजमार्गों पर रिअलाइनमेंट सहित सुरंग निर्माण समेत कई परियोजनाओं की डीपीआर (विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट) अभी तैयार हो रही है, इन्हें केंद्र से स्वीकृति मिलने में समय लगेगा। हालांकि राज्य सरकार अक्तूबर-नवंबर से सड़क निर्माण में तेजी लाने के प्रयास में है। वहीं, मार्च 2015 के बाद बीआरओ के बदले दूसरी निर्माण एजेंसी को सड़कें सौंपने से दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

सड़क पर सियासत
प्रदेश सरकार, केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय और सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के बीच खींचतान से पुनर्निर्माण रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा। बीआरओ के कामकाज से प्रदेश सरकार और केंद्र खुश नहीं हैं। मंत्रालय अपनी अलग एजेंसी बना चुका है जबकि राज्य सरकार लोक निर्माण विभाग से काम कराना चाहती है। बीआरओ का कहना है कि पुनर्निर्माण के प्रस्ताव भेजने में हुई देरी से समय रहते स्वीकृतियां नहीं मिलीं। आपदा के नौ माह बाद प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें