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पहाड़ के विकास के लिए केंद्र को घेरेगा 'सरकारी' ग्रुप

Sun, 31 Jan 2016 02:01 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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पर्वतीय राज्यों को ध्यान में रखते हुए नीतियां और योजनाएं बनाने के लिए उत्तराखंड सरकार अब एडवोकेसी ग्रुप का गठन करेगी।
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यह ग्रुप केंद्र पर दबाव बनाने का काम करेगा। इसके लिए प्रदेश सरकार पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट सहित अपने-अपने क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को एक मंच पर लाने की कवायद में जुटी है।

मुख्यमंत्री के सलाहकार और प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव डॉ. इंदु कुमार पांडे ने इसकी पुष्टि की। केंद्र से उपेक्षा की शिकायत राज्य पहले से ही करता आ रहा है। केंद्र में भाजपा और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के कारण इस शिकायत को राजनीतिक रूप भी मिल चुका है।
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इस राजनीतिक नूरा कुश्ती से इतर पहले से ही यह माना जाता रहा है कि पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग से विकास का मॉडल होना चाहिए। पूर्व में योजना आयोग की बीके चतुर्वेदी कमेटी ने केंद्र सरकार का ध्यान इस और खींचा भी था।

कमेटी के सदस्य रहे प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव डॉ. आरएस टोलिया के मुताबिक कमेटी ने हिमालयी राज्यों के लिए ग्रीन बोनस देने की संस्तुति की थी और विकास में पिछड़ेपन को आधार बनाते हुए संकेतक (इंडेक्स) भी तैयार किया था। फिलहाल यह मामला केंद्र के स्तर पर लंबित है।

अब प्रदेश सरकार इन मामलों की केंद्र में पैरवी के लिए राज्य में अलग से समूह गठित करने जा रही है। इसको एडवोकेसी ग्रुप नाम दिया जा रहा है। यह समूह राज्य की विशेष जरूरतों के हिसाब से केंद्र के सामने राज्य का पक्ष रखेगा और उसकी पैरवी करेगा।
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पहले भी होती रही है कोशिश

पर्वतीय राज्यों के लिए अलग नीतियों और योजनाओं को बनाने की मांग राज्य गठन के पहले से ही होती रही है। उत्तरप्रदेश में इसके लिए बाकायदा पर्वतीय विकास मंत्रालय बनाया गया था। राज्य गठन के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत अब अलग से प्रकोष्ठ का गठन भी किया गया है।

बहुगुणा ने बुलाया था सम्मेलन
हिमालयी राज्यों की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए विकास का नया मॉडल तय करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने अलग से दिल्ली में हिमालयी राज्यों का सम्मेलन भी बुलाया था। जून 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद इस मुद्दे के जोर पकड़ने पर तत्कालीन सरकार को यह फैसला करना पड़ा था। बाद में यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

क्यों पड़ी जरूरत?
- विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालयी राज्यों में शहर केंद्रित विकास का मॉडल चल नहीं पा रहा है। शहरीकरण की जगह पर्वतीय राज्यों को आपदा और अन्य कारणों से भारी पलायन का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के बाद भी उसका फायदा लोगों तक पहुंच रहा है।
- पहाड़ में एक किलोमीटर सड़क निर्माण पर करीब 52 लाख रुपये खर्च करना पड़ रहा है, जबकि मैदान में इतनी ही सड़क 28 लाख रुपये में तैयार होती है। इसी तरह पर्वतीय क्षेत्रों में उद्योगों को पहुंचाने में सरकार को दस साल बाद भी सफलता नहीं मिल पाई। विशेष औद्योगिक पैकेज का सारा लाभ तीन मैदानी जिलों को मिला।
- हिमालयी राज्यों में पर्यावरण एक संवेदनशील मसला है। इसके चलते भी विकास का मॉडल सफल नहीं हो पा रहा है। इसी समस्या के चलते हिमालयी राज्य ग्रीन बोनस की मांग कर रहे हैं।

नीति नियोजन समूह की बैठक में इस पर विचार किया गया था। मुख्यमंत्री हरीश रावत का साफ कहना था कि हिमालयी राज्यों की समस्याओं को लेकर केंद्र सरकार संवदेनशील नहीं है। प्रदेश में उच्च स्तरीय एडवोकेसी ग्रुप का गठन किया जाए। इस दिशा में विभिन्न लोगों से बातचीत की जा रही है। जल्द ही इसे अंतिम रूप दे दिया जाएगा।
- डॉ. इंदु कुमार पांडे, सलाहकार मुख्यमंत्री
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