उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई शुरू करने की सजा भुगत रहे निलंबित दरोगा निर्विकार सिंह ने पीएचक्यू से लेकर शासन तक किसकी चौखट पर दस्तक नहीं दी, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ।
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सर्विस में आने से पहले ईमानदारी पूर्वक न्यायोचित कार्य करने, बगैर किसी राग द्वेष के निर्णय लेने की शपथ लेने वाले आईएएस, आईपीएस अफसरों ने भी कोई मदद नहीं की। बगैर किसी आधार के कई मुकदमे दर्ज हुए। जांचों का सिलसिला शुरू हुआ तो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हाईकोर्ट व मुख्यमंत्री के दखल ने निर्विकार को अभी तक महकमे में बचाकर रखा है।
जमीन की कहानी
21 मई 2012 को डीजी बीएस सिद्धू ने मसूरी वन प्रभाग के तहत वीरगिरवाली रेंज ओल्ड मसूरी रोड पर नौ बीघा जमीन खरीदने का एग्रीमेंट मेरठ के रोहटा निवासी नत्थूराम से किया। जबकि नत्थूराम की 31.12.1983 को मृत्यु हो चुकी थी। शर्त थी कि नत्थूराम तीन महीने में जमीन का डिमार्केशन कराकर देगा तभी रजिस्ट्री होगी। यह काम तय समय में नहीं हुआ तो तीन महीने का समय और बढ़ा दिया गया।
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इसके बाद भी 05.07.2012 को डिमार्केशन की प्रक्रिया शुरू हुई तो नत्थूराम ने इसी दिन कोतवाली में अपराध संख्या 219/2012 केतहत दर्ज कराए गए मुकदमे में आरोप लगाया कि मेरठ के रहमूद्दीन ने मेरी जमीन फर्जी नत्थूराम बनकर पावर ऑफ अटार्नी कर दी। एसडीएम सदर ने 26.10.2012 को डिमार्केशन की कार्रवाई यह कहते हुए रोक दी कि लेखपाल और कानूनगो की रिपोर्ट में यहां पर घना जंगल है, इसलिए सीमांकन नहीं किया जा सकता।
बावजूद 20.11.2012 को सिद्धू ने इस जमीन को क्रय कर लिया। इसके बाद सबसे पहले 09.03.2013 को चार पेड़ इस जमीन से काटे गए और फिर 18.03.2013 को 21 पेड़ काटे गए। फारेस्ट ने सिद्धू के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच की और चार्जशीट सीजेएम कोर्ट में दाखिल की। सीजेएम कोर्ट ने सिद्धू को समन भेजकर 04.08.2013 को हाजिर होकर जमानत कराने को कहा। सिद्धू ने एडीजे कोर्ट से स्थगनादेश ले लिया। 09.07.2013 को सिद्धू ने डीएफओ मसूरी धीरज पांडेय समेत कई अफसरों के खिलाफ थाना राजपुर में मुकदमा दर्ज कराया। फारेस्ट के अफसर उच्च न्यायालय चले गए, अभी यह मामला विचाराधीन है।
इन पर गिरी गाज
केवल खुराना, एसएसपी यूएसनगर डीजीपी की मर्जी के हिसाब से जांच नहीं करा सके, बार-बार फारेस्ट के अफसरों की धरपकड़ के दबाव को नहीं माना, सीओ स्वतंत्र कुमार द्वारा सिद्धू के खिलाफ की गई जांच रिपोर्ट को सपोर्ट कर पीएचक्यू भेजा और कार्रवाई की संस्तुति की। इसके बाद से खुराना और सिद्धू के बीच ठन गई और उन्हें कुमाऊं में सीबीसीआईडी में अपर पुलिस अधीक्षक की पोस्ट पर तैनाती दी गई। अब दो साल बाद मुख्यमंत्री ने खुराना को अब यूएसनगर का कप्तान बनाया।
जगदीश चंद्र आर्य, तत्कालीन एसपी सिटी जांच मन मुताबिक नहीं हुई तो एसपी सिटी रहे जगदीश चंद्र की भी विदाई हो गई। उसके बाद आज तक जगदीश चंद्र साइड पोस्टिंग ही काट रहे हैं।
नवनीत सिंह भुल्लर, तत्कालीन एसपी सिटी जगदीश चंद्र के बाद नवनीत सिंह भुल्लर एसपी सिटी बने, लेकिन उन्होंने तमाम दबावों के बावजूद निर्विकार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई नहीं की तो कुछ दिन बाद उनकी भी विदाई हो गई। बहुत दिन तक कभी एसडीआरएफ तो कभी कहीं चक्कर काटते रहे। पिछले दिनों अब हरिद्वार में पोस्टिंग मिली।
हरीश चंद्र सती, तत्कालीन डिप्टी एसपी यह उस समय देहरादून में तैनात थे और सिद्धू के मन मुताबिक जांच नहीं की तो पिथौरागढ़ भेज दिए गए। तब से यह भी प्राइम पोस्टिंग नहीं पा सके।
निर्विकार सिंह, निलंबित उप-निरीक्षक तीन दिन विवेचना की तो 20 महीने बाद भी बहाली नहीं हुई। 15.12.2013 को रुद्रप्रयाग ट्रांसफर कर दिए गए। 22.01.2014 को निरीक्षक के इंटरव्यू में 10 में से 04 अंक देकर बाहर कर दिए गए। 05.04.2014 को निर्विकार ने एसएसपी दून, निरीक्षक कोतवाली को पत्र भेजकर स्वयं द्वारा तीन दिन की गई जांच में पाए तथ्यों को विवेचना का हिस्सा बनाने की मांग की, लेकिन उल्टी जांच शुरू हो गई। 17.05.2014 को निर्विकार ने डीजीपी पर मीडिया के सामनेे गंभीर आरोप लगाए तो 19.05.2014 को सस्पेंड कर दिए गए। वह अब भी निलंबित ही है। उनके खिलाफ कई जांच और मुकदमे विचाराधीन है।
स्वतंत्र कुमार, डिप्टी एसपी जमीन के मामले का खुलासा होने के बाद सत्यव्रत बंसल ने इन्हीं डिप्टी एसपी स्वतंत्र कुमार से सिद्धू के मामले की जांच कराई थी। स्वतंत्र ने जांच में पाया था कि यह मामला गंभीर है और इसकी जांच सीबीआई से कराई जानी चाहिए। इन्हीं की जांच को तत्कालीन एसएसपी केवल खुराना व तत्कालीन डीआईजी अमित सिन्हा ने आगे बढ़ाया। जांच के लिए यही रिपोर्ट तत्कालीन डीजीपी ने मुख्य सचिव को भेजी। इस जांच के चक्कर में ही स्वतंत्र कुमार ने दो साल रुद्रप्रयाग में काटे, अब जाकर नैनातील में पोस्टिंग मिली।
अमरजीत सिंह, तत्कालीन एसओ राजपुर उच्च न्यायालय ने हड़काया तो जमीन से जांच से विरत होने की बात सीडी (केस डायरी) में लिख दी। इसलिए डीजी सिद्धू की आंख की किरकिरी बन गए। डीजी ने युवाओं में नशाखोरी रोकने का ऐलान किया कि जिस एसओ के क्षेत्र में नशीले पदार्थ पकड़े गए, उसे सस्पेंड किया जाएगा। कुछ ही दिन बाद एसटीएफ ने राजपुर क्षेत्र में मादक द्रव्य पकड़े और अमरजीत सिंह सस्पेंड कर उत्तरकाशी भेज दिए गए। हालांकि इससे पहले और बाद में कभी ना तो यह अभियान चलता दिखा और ना ही कोई सस्पेंड हुआ।
जेपी जुयाल, निरीक्षक जुयाल कोतवाली प्रभारी थे। जांच सिद्धू के मुताबिक नहीं हुई तो टिहरी भेज दिए गए। तब से उन्हें कोई चार्ज नहीं मिला। इसके बाद वह कुंभ में आए और अब डिप्टी एसपी प्रमोशन होने के बाद दोबारा रुद्रप्रयाग भेज दिए गए।
इंदुभूषण नौटियाल, निरीक्षक रुद्रप्रयाग पुलिस इंस्पेक्टर नौटियाल, पूर्व डीजीपी सत्यव्रत बंसल के पीआरओ थे। सिद्धू डीजीपी बने तो सबसे पहले इन्हें रुद्रप्रयाग भेजा। एक पुरानी फाइल की जांच में दोषी पाकर उनके खिलाफ दंडादेश पारित कर विगत जुलाई माह में न्यूनतम वेतनमान पर ला दिया गया। यह दंडादेश एसएसपी देहरादून रहे पुष्पक ज्योति ने जारी किया।
जया बलूनी, डिप्टी एसपी, अब विजिलेंस में फारेस्ट से हुए झगड़े के बाद जब मसूरी वन प्रभाग में ही हाथी पांव से पेड़ काटने की घटना हुई तो तत्कालीन सीओ जया बलूनी को जांच अधिकारी नामित कर फारेस्ट वालों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा। जबकि इससे पहले फारेस्ट विभाग कार्रवाई कर मामले का खुलासा कर चुका था। जया बलूनी के भी बुरे दिन शुरू हुए और वह पोस्टिंग के लिए भटकती रही। इसके बाद मुश्किल से उन्हें विजिलेंस में तैनाती मिली।
- जब फारेस्ट विभाग ने सिद्धू के खिलाफ सीजेएम कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी थी तो फिर उन्हें डीजीपी के पद पर नियुक्ति कैसे दी गई? - तत्कालीन आयुक्त गढ़वाल की जांच में नत्थूराम की मौत 1983 में हो चुकी थी, फिर यह कौन नत्थूराम था, इसकी जांच आज तक क्यों नहीं की जा सकी? - मामले का खुलासा होने पर जब प्रशासन ने सिद्धू से जमीन छीन ली तो फिर फ्राड तरीके से रिजर्व फारेस्ट की जमीन खरीदने का मुकदमा कायम क्यों नहीं हुआ? - तत्कालीन कमिश्नर गढ़वाल सुबर्द्धन ने जांच में पाया कि यह जमीन 1972 से रिजर्व फारेस्ट की थी। गलत तरीके से जमीन खरीदी गई? - तत्कालीन सुभाष कुमार ने डीजी सिद्धू के खिलाफ एनजीटी में शपथपत्र दाखिल कर अवैध तरीके से जमीन खरीदने और पेड़ कटने की बात कही, लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया? - शासन को तत्कालीन डीजीपी सत्यव्रत बंसल की सिफारिश के बावजूद सीओ स्वतंत्र कुमार की जांच रिपोर्ट पर शासन सरकार ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया? - विगत पांच जनवरी को राज्य मानवाधिकार आयोग निलंबित दरोगा निर्विकार की शिकायत पर सुनवाई के दौरान प्रमुख सचिव गृह को डीजीपी पर लगे आरोपों की जांच कर 28 मार्च तक रिपोर्ट देने का निर्देश दिया, लेकिन अभी तक जांच शुरू नहीं हो सकी?