उत्तराखंड को अस्तित्व में आए 14 साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन आपदा और मौसम की दृष्टि से संवेदनशील राज्य की बेसिक जरूरतों पर भी फोकस नहीं किया जा सका है।
सबसे पहले मौसम का ही जिक्र
आलम यह है कि 14 साल में आगे जाने की जगह हम और पीछे हो गए हैं। सबसे पहले मौसम का ही जिक्र करते हैं। सालों गुजर चुके, प्रस्ताव के बावजूद न तो यहां डाप्लर रडार लग पाया और न ही एडवांस्ड वर्क स्टेशन तैयार हो सका। यहां वेदर स्टेशन जरूर हैं, लेकिन रडार, लाइट डिटेक्टर जैसे उपकरण मुहैया नहीं।
आपदा कभी कहकर नहीं आती, लेकिन सिर्फ यही सोचकर सामने खड़े खतरे से नजर नहीं चुराई जा सकती। प्रदेश में डाप्लर रडार का प्रस्ताव तकरीबन पांच साल पुराना है। अबकी मौसम विज्ञान विभाग के एलएस राठौर ने अपने दून दौरे के दौरान डाप्लर राडार पर बात आगे बढ़ने का दावा किया था, लेकिन बात आगे बढ़ नहीं सकी है।
एडवांस्ड वर्क स्टेशन होने से एक साथ कई स्क्रीन मानिटरिंग संभव हो पाएगी, लेकिन अभी यह इंस्टाल नहीं हो सका है। आपदा की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में सेंटर आफ क्लाइमेट चेंज की विधिवत स्थापना नहीं हुई है। इसका केवल परिसर ही काम कर रहा है अल्मोड़ा में। इसकी स्थापना के भी प्रयास चल रहे हैं, लेकिन नाकाफी हैं।
उत्तराखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर (यू-सैक) के निदेशक डा. एमएम किमोठी के यहां से चले जाने के बाद सेंटर को पूर्णकालिक निदेशक नहीं मिल सका है। सेटेलाइट मैपिंग का अहम कार्य यह सेंटर करता है। फिलहाल यूसैक के प्रोजेक्ट्स समेत सेटेलाइट मैपिंग के कार्य में दिक्कत आ रही है।
यह कार्य प्रभावित हो रहा है। सेंटर की तरफ से भूस्खलन जैसी आपदा की पूर्व सूचना के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने का दावा भी किया गया था, लेकिन सच यह है कि इस सिस्टम ने भी कार्य करना अभी शुरू नहीं किया है।
आंध्र के सिस्टम से भी नहीं सीखा
आपदा प्रबंधन और विभिन्न विभागों के बीच ताल-मेल आंध्र प्रदेश से सीखने की जरूरत है। आंध्र प्रदेश में सवा सौ से अधिक आटोमेटिक वेदर स्टेशन हैं। इसके अलावा जर्मनी से आयातित एस-बैंड डाप्लर वेदर रडार लगा हुआ है।
साइक्लोन से प्रभावित होने वाले इस राज्य में साइक्लोन डिटेक्शन रडार तो है ही, रेडियो एकाउस्टिक साउंडिंग सिस्टम भी बेहतर है। हवा और तापमान पर निगाह रखने के साथ ही निचाई वाले बादलों के आधार की मानीटरिंग के लिए लेजर सीलोमीटर भी लगा है।
एसएमएस के माध्यम से मौसम से जुड़ी किसी भी तरह की सूचना आपदा प्रबंधन केंद्र के जरिए कृषि, सिंचाई, जल जैसे विभागों तक पहुंचती है। यह समन्वय बेहतर नतीजे दिलाता है।