उत्तराखंड राज्य आंदोलन के समय 58 दिन तक केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ में बंद रहे राज्य आंदोलनकारी गोपू महर का कहना है कि इस राज्य का विकास कैसे होगा। यहां के चाय बागानों पर माफिया का कब्जा हो चुका है।
यूपी के समय से अब हुआ ज्यादा पलायन
अब किस मुंह से कहेंगे कि उत्तराखंड की चाय दिल्ली में बिकेगी। सरकार ने आंदोलनकारी चिन्हीकरण का ड्रामा इसलिए किया ताकि आंदोलनकारी ताकतें आपस में बंट जाएं। जो लोग कहते थे कि मेरी लाश पर उत्तराखंड बनेगा वही सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
आंदोलनकारी गोपू महर के मन में भारी टीस है। वह जानना चाहते हैं कि ऊर्जा प्रदेश, पर्यटन प्रदेश, आयुष प्रदेश का क्या हुआ। पलायन की स्थिति यह है कि यूपी के समय से ज्यादा पलायन हो रहा है। सरकार अब तक वन, रोजगार की नीति नहीं बना पाई।
शिक्षा, चिकित्सा की हालत और खराब है। गोपू महर को सरकार ने आंदोलनकारी घोषित किया। बाद में उनको सरकारी नौकरी का आफर भी दिया। उन्होंने यह कहकर नौकरी लेने से इंकार कर दिया कि राज्य के सभी नौजवानों को नौकरी मिलनी चाहिए।
आंदोलन कुछ खास लोगों ने नहीं किया। इसमें हर वर्ग की भागीदारी थी। उन्होंने सरकार से जानना चाहा है कि आंदोलनकारी स्व. निर्मल पंडित को आंदोलनकारी का दर्जा क्यों नहीं मिला। उनके परिजनों को आर्थिक सहायता क्यों नहीं दी गई।
सरकारों ने किया युवाओं का शोषण
सरकारों ने आंदोलनकारी के क्या मापदंड बनाए थे। कुमौड़ निवासी गोपू महर इस समय छोटे मोटे ठेके लेकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। वह कहते हैं कि राज्य में जितनी भी सरकारें अब तक बनी हैं सभी ने यहां के युवाओं का सिर्फ शोषण किया।
उनके लिए कोई ठोस नीति तैयार नहीं की। बेरोजगारों की बढ़ती जा रही फौज इस राज्य के लिए नई चिंता का विषय हो सकता है।