चिंतन करेंगे तो शायद तब ही हम एक आदर्श राज्य बन पाएंगे
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड को अब एक विज्ञान आधारित मॉडल राज्य बनाने के लिए कोशिशें भी दिखाई देती है। इन सबके बीच आज भी कहीं कुछ सवाल अवश्य खड़े हैं। उत्तराखंड की मांग के पीछे इनके गांव स्थानीय लोगों और पहाड़ी हिस्से का कहीं विकास की मुख्यधारा से बहुत दूर रह जाना था।
अगर आज इस पहलू का आकलन करें तो शायद उस ओर हम अभी उतने गंभीरता से आगे नहीं बढ़ पाए, जिसकी कि आज बड़ी आवश्यकता है। ऐसा नहीं कि इस दिशा में प्रयास नहीं हुए। सरकारों ने और गैर सरकारी स्तर पर भी कई प्रयोग हुए है और इन्हीं से राज्य का भविष्य संवर सकता है, लेकिन बड़ी आवश्यकता है इन प्रयोगों के व्यापक होने की है।
आज यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन तमाम पहलुओं को जो 23 वर्षों में किन्हीं कारणों से नकार दिए गए, उन्हें मुख्यधारा में लाकर नई सोच बनाएं। अगर उन पर चिंतन करेंगे तो शायद तब ही हम एक आदर्श राज्य बन पाएंगे। यह भी तय है कि यह राज्य अन्य हिमालयी राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा चर्चित राज्य है, क्योंकि यहां बहुत से जन आंदोलनों ने जन्म लिया है।
यह बन सकते हैं बड़े अवसर
यहां से गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ, केदारनाथ जैसे धाम देश की आस्था के प्रतीक भी हैं, इसलिए यह एक बड़ा अवसर भी बन सकता है कि हम हिमालयी राज्यों का आदर्श तो बनें। साथ में एक ऐसा राज्य बने जो आर्थिक और पारिस्थितिकी के समन्वय से चलता हो। आज सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य को युवाओं के हिस्से में ज्यादा लाना चाहिए।
ये भी पढ़ें...Uttarakhand Nikay Chunav: इस बार के मैदानी जिलों में ओबीसी की सीटें बढ़ेंगी, पर्वतीय में घटेंगी
वो राजनीतिक क्षेत्र हो या आर्थिक और सामाजिक, क्योंकि युवा ही हैं जो नई सोच के साथ राज्य को एक दिशा दे सकते हैं। हम यह भी नहीं कह सकते कि 23 सालों में कुछ नहीं हुआ, लेकिन यह जरूर कहना चाहेंगे कि जो कुछ होना चाहिए, उसमें अभी हम कहीं पीछे हैं। मैं समझता हूं कि सरकार व राजनीतिक दलों को खुद 23 सालों का ईमानदारी से आकलन करना चाहिए, ताकि वे राज्य का बेहतर भविष्य बना सकें।
-अनिल जोशी लेखक : मशहूर पर्यावरणविद और अग्रणीय सामाजिक कार्यकर्ता हैं