उत्तराखंड के प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और नैनीताल से भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी की पहचान पहाड़ के ठेठ नेता के रूप में है।
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समर्थकों के बीच भगत दा के नाम से जाने जाने वाले कोश्यारी की प्रदेश की राजनीतिक में अच्छी दखल है। चुनाव चाहे कोई भी हो लोकसभा का या विधानसभा का भाजपा में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। 18 मार्च के बाद प्रदेश में जो स्थितियां बनी थीं उसमें कोश्यारी भाजपा का नेतृत्व करते हुए दिखे। उस वक्त उनका व्यवहार भी सीएम जैसा दिखने लगा था।
परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि समीकरण भाजपा के पक्ष में नहीं गया। इसके बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी कैबिनेट का विस्तार किया तो कोश्यारी को उसमें जगह दिए जाने की चर्चा रही, लेकिन यहां भी उनके हाथ निराशा लगी।
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18 मार्च के बाद प्रदेश की राजनीति में जो बदलाव आया, उनको केंद्रीय कैबिनेट में जगह क्यों नहीं मिली, आगामी विधानसभा चुनावों में उनकी क्या भूमिका होगी, मुख्यमंत्री हरीश रावत को वो कुमाऊं में कैसे घेरेंगे? इस सभी मुद्दों को लेकर अमर उजाला संवाददाता कृष्णेंदु कुमार के तीखे सवालों के जो जवाब कोश्यारी ने दिए, आप भी पढ़िए...
18 मार्च के बाद प्रदेश में जो परिस्थितियां बनी थीं। उसकी कमान आपके हाथ में थी। कमी कहां रह गई जो आपकी प्लानिंग फेल हो गई?
-18 मार्च को जो वित्त विधेयक का घटनाक्रम हुआ। उसके बारे में मुझे 17 मार्च को ही पता था। मुझे पार्टी की ओर से कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। पार्टी ने सबको जिम्मेदारी दी थी। प्रमुख लोगों को बताया जाता है ये घटना है इस पर काम करो। 17 को मैं अल्मोड़ा में था, मेरा प्रोग्राम तो दिल्ली जाने था। 18 मार्च की सुबह मैं यहां आया था। मेरा किसी से व्यक्तिगत रूप से संपर्क नहीं हो पाया था, टेलीफोन पर जरूर कुछ लोगों से बातचीत हुई थी। मैं पूर्व मुख्यमंत्री रहा हूं, सांसद हूं। संसदीय प्रणाली का थोड़ा बहुत ज्ञान होने के कारण मैंने राज्यपाल से आग्रह पूर्वक कहा था कि वित्त विधेयक गिरने का मतलब है सरकार का गिर जाना। अगर राज्यपाल ने हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए तीन-चार दिन का वक्त दिया होता तो आज यह झगड़ा ही नहीं खड़ा होता। राज्यपाल ने दस दिन से अधिक का वक्त दे दिया। इसके बाद मामला कोर्ट में चला गया।
कुछ अन्य सवाल...
भगत सिंह कोश्यारी
- फोटो : AmarUjala
क्या आपको पार्टी से इस तरह का कोई संकेत मिला था कि हरीश रावत का तख्ता पलट होता है तो आपको सीएम बनाया जाएगा?
-2001 में भी जब मुख्यमंत्री बना था उस वक्त भी मुझे पता नहीं था कि मैं मुख्यमंत्री बनने वाला हूं। पार्टी की ओर से इस तरह का कोई संकेत नहीं दिया गया था। मुझे किसी तरह का संकेत मिलने की बात में दूर-दूर तक सच्चाई नहीं है। मेरे पास अनुभव है। मेरी कोशिश थी कि इस मामले में न्याय हो सके। बस इसी दिशा में मैंने कोशिश की।
इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका को आप किस नजरिये से देखते हैं?
-उत्तराखंड के विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल अपने को विधानसभा से ऊपर समझते हैं। एक तरह से मुख्यमंत्री के कहने पर चलते हैं। उन्होंने 18 मार्च के मत विभाजन के बाद केवल ध्वनि मत से विधेयक पास मान लिया। यह अत्यंत ही पक्षपात पूर्ण, असंवैधानिक और गैरकानूनी कार्य था, अगर उसी दिन वित्त विधेयक पास हो गया था तो अब विधानसभा में दोबारा बजट क्यों पास कराया? इससे साफ हो जाता है कि 18 मार्च को कुंजवाल ने विधानसभा में जो कार्य किया था वह संविधान विरोधी था। एक तरह से कुंजवाल ने प्रजातंत्र की हत्या करने का काम किया है। जिन नौ विधायकों की सदस्यता को उन्होंने खारिज करने का फैसला सुनाया वह भी उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। क्योंकि उस वक्त उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित था।
केंद्रीय कैबिनेट के विस्तार में आपको मंत्री बनाए जाने की चर्चा थी। ऐसा क्या हुआ कि ऐन मौके पर आपका पत्ता साफ हो गया?
- चर्चा में कौन मेरा नाम लाया? मेरा नाम तो चर्चा में आता है। चर्चा करने में हर्जा क्या है? ऐसा तो हुआ नहीं कि चर्चा में मेरा नाम आया, मैं मंत्री नहीं बना तो घर बैठ गया। चर्चा में रहा, गायब नहीं हुआ, इतना ही बहुत है। केंद्रीय कैबिनेट में जगह क्यों नहीं मिली यह मेरे सोचने का विषय नहीं है। मेरे संसदीय क्षेत्र के लोगों ने मुझे 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में सर्वाधिक मतों से विजयी बनाया है। मैंने तो पहले ही कह रखा है कि मैं 2019 में लोकसभा का चुनाव नहीं लडूंगा। नये लोग सामने आने चाहिए।
प्रदेश में विधानसभा का चुनाव नजदीक है। क्या भाजपा को पार्टी का चेहरा सामने नहीं लाना चाहिए?
-ये विषय मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर का है। पार्टी के संचालक जनभावनाओं का, कार्यकर्ताओं की भावनाओं को देखते हुए आंकलन करेंगे। पार्टी को लगेगा को किसी का चेहरा आगे लाएंगे। नहीं लगेगा तो नहीं लाएंगे।
अगर पार्टी आपको चेहरा बनाती है तो ?
-यह तो काल्पनिक बात हो गई। काल्पनिक सवालों का जवाब मैं नहीं देता हूं।
क्या प्रदेश में भाजपा कुमाऊं और गढ़वाल के बीच बंटी हुई है। आप पर भी आरोप लगते रहे हैं कि आप गढ़वाल के नेताओं को आगे नहीं बढ़ने देते हैं?
-मैंने गढ़वाल के किसी नेता को आगे बढ़ने का विरोध नहीं किया है। 2007 में बीसी खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने तो क्या मैंने विरोध किया था? निशंक भी तो गढ़वाल से ही मुख्यमंत्री बने थे। निशंक के बाद दोबारा खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। मैंने तो कभी विरोध नहीं किया। इसका सबसे अच्छा जवाब तो प्रदेश के मुख्यमंत्री दे सकते हैं। उनके पूछकर देख लीजिए क्या वो मुझे सिर्फ कुमाऊं का नेता मानते हैं। मैंने गढ़वाल-कुमाऊं में कोई भेद नहीं किया। मुझे तो सब जगह प्यार मिलता है। गढ़वाल-कुमाऊं की बात तो छोड़िए नेपाल में पूछिए लोग बताएंगे मैं वहां कितना लोकप्रिय हूं।
कुमाऊं की राजनीति की बात चलती है तो कांग्रेस से हरीश रावत और भाजपा से आपको लेकर तुलना होती है ?
-एक बात मैं स्पष्ट कर दूं। मैं हरीश रावत जैसा जमीन से जुड़ा नेता नहीं हूं। वो जितनी जमीनें बेच रहे हैं। रोडी-बजरी वो बेच रहे हैं। ऐसा नेता मुझे नहीं बनना है कि जमीनी नेता होकर जमीन पर नजर गड़ाए रखो और उसका लैंड यूज चेंज करते रहो। इससे अच्छा है तो ऐसा ग्रास रूट लीडर नहीं बनो। किसानों को जमीन दो, आपदाग्रस्त 400 गांव हैं, वहां के लोगों को जमीन उपलब्ध कराओ, तब तो जमीनी नेता कहलाओगे। हरीश रावत को पता नहीं किन-किन कंपनियों को जमीन दे रहे हैं। वास्तव में वो जमीन बेचू नेता हैं। जहां तक कुमाऊं में उनसे मुकाबले का सवाल है तो भाजपा में कोई भी हरीश रावत और कांग्रेस से मुकाबला कर लेगा।
सतपाल महाराज से आपकी कोई कटुता है क्या है?
- वो महाराज, हम सेवक हैं। उनका धार्मिक कद बहुत ऊंचा है। वो हमारे अच्छे मित्र हैं। उनको हमारी शुभकामनाएं हैं। पार्टी में उनका आदर किया जा रहा है, सत्कार किया जा रहा है।
कांग्रेस के जो नौ पूर्व विधायक आए है उनको लेकर पार्टी में विरोध के स्वर उठ रहे हैं ?
-भाजपा सतत आगे बढ़ने की नीति पर विश्वास करती है। यह किसी एक व्यक्ति या परिवार की तो पार्टी है नहीं। यही वजह है कि आज इसकी सांसदों की संख्या बढ़कर 282 हो गई है। समाज के सभी लोगों को भाजपा जोड़कर चलती है। पार्टी में जो लोग भी आए हैं वो मुख्यमंत्री रहे हैं, मंत्री रहे हैं, विधायक रहे हैं। जो लोग पार्टी में आएं हैं वो बिना शर्त आए हैं। उनको लेकर पुराने कार्यकर्ताओं में जो सवाल उठ रहे हैं स्वाभाविक है। कोई भी लंबे समय से पार्टी में कार्य करता है तो उसकी इच्छा होती है, उसके समर्थकों की इच्छा होती है कि उनको भी मौका मिलना चाहिए। पार्टी में कोई डिक्टेटरशिप थोडे़ ही है। सब को अपनी बात रखने की आजादी है।
आने वाले दिनों में आपकी और पार्टी की रणनीति क्या होगी?
-अपनी रणनीति तो मैं किसी को बताता नहीं हूं। पार्टी की रणनीति पार्टी तय करेगी।
अगले संडे इंटरव्यू में आप से मुखातिब होंगे, राज्य के मुखिया हरीश रावत। चाहे कांग्रेसी हो या भाजपाई, संडे इंटरव्यू के हर किरदार के निशाने पर हरीश रावत ही रहे। निशाने भी ऐसे-ऐसे कि करीब-करीब हर संडे इंटरव्यू के हेडिंग हरीश रावत पर लगे आक्षेप पर बने। इस बार हम उन्हीं सवालों के घेरे में रावत को लेंगे, जो संडे इंटरव्यू के विभिन्न एपीसोड में उन पर लगे हैं। साथ ही हम प्रदेश के आवाम से भी गुजारिश करेंगे कि वे अमर उजाला के इस मंच का इस्तेमाल करते हुए अपने मुख्यमंत्री से सवाल पूछें। आपके सवाल हम मुख्यमंत्री तक पहुंचाएंगे और जवाब संडे इंटरव्यू में प्रकाशित करेंगे। इसके लिए आप हमें बुधवार तक पत्र, मेल या फोन के जरिए सवाल भेज सकते हैं।
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