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जब पहली बार ली थी आजादी की हवा में सांस तो कुछ ऐसा था माहौल

Sun, 14 Aug 2016 06:53 PM IST
मनीष त्रिपाठी/ अमर उजाला, विकासनगर
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चंदन लाल अग्रवाल - फोटो : amar ujala
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नमस्कार...। ये ऑल इंडिया रेडियो का दिल्ली केंद्र है। भारत आजाद हो चुका है और आप सब आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं। कुछ इन्हीं लाइनों के साथ आज से 70 साल पहले रेडियो पर जब लोगों ने आजादी की खबर सुनी, तो पूरा शहर खुशी से झूम उठा था।
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जगह-जगह मिठाइयां बंटने लगी। लोगों ने घरों को केले के पत्तों, फूलों से सजाया। जगह-जगह प्रभात फेरी निकाल कर जय सुभाष, जय नेहरू, जय भगत सिंह के नारे गूंजने लगे। यह कहना है कि पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष और स्वतंत्रता सैनानी चंदन लाल अग्रवाल का।

अमर उजाला के साथ स्वतंत्रता दिवस की यादें सांझा करते हुए 87 वर्षीय चंदन लाल कहते हैं कि आजादी के समय मेरी उम्र कुछ यही 17 साल की होगी। रोज की तरह 15 अगस्त 1947 की सुबह भी सब देश में चल रहे हालात को जानने के लिए 50-60 लोगों को जमावड़ा मेरे घर के बाहर लगा हुआ था। उस समय विकासनगर को चौहड़पुर के नाम से जाना जाता था।
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शहर की आबादी कोई 2000 के आसपास थी। तब हमारे घर को छोड़ किसी के पास रेडियो नहीं था तो सुबह के समय सब खबर सुनने हमारे घर ही आया करते थे। सुबह को जब पिता जी ने रेडियो खोला तो न्यूज रीडर बड़े गर्व से देश की आजादी की खबर को जोर-जोर से पढ़ रहा था। जिसको सुन पूरा शहर झूम उठा।

सभी लोग मुख्य बाजार स्थित तिलक भवन पर एकत्र हो गए। जहां लोगों ने भारत माता की जय के नारे लगाए। स्वतंत्रता सैनानी स्व. लाला सेवाराम ने तिरंगा लहराया और पूरी फिजा में उस दौरान वंदे मातारम गूंज उठा। रातभर जश्न का माहौल था।
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भारत माता की जय बोलने पर पड़ी थी बेत

स्वतंत्रता संग्राम - फोटो : अमर उजाला
स्वतंत्रता सेनानी चंदन लाल अग्रवाल बताते हैं कि 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। हर जगह सुभाष चंद्र बोस के समर्थन में आवाज बुलंद होने लगी थी। जगह-जगह लोग गिरफ्तारियां दे रहे थे। उस दौरान क्षेत्र से स्व. लाला सेवाराम भी सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी के साथ जुड़े हुए थे सो मैं और मेरे कुछ मित्र भी स्व लाला सेवाराम के साथ गिरफ्तारी देने निकल गए।

उस दौरान मेरी उम्र कोई 14 साल रही होगी। क्षेत्र के कलेक्टर ब्रिटिश मूल के जॉनसन थे। जब उन्होंने मुझे और मेरे कुछ दोस्तों को गिरफ्तारी देते समय वंदे मातरम और भारत माता की जय बोलते सुना तो वह हमें वहां से उठाकर विकासनगर बाजार स्थित आशाराम वैदिक स्कूल ले आए। जहां पर उन्होंने वहां मौजूद सैनिकों को हमें 12-12 बेते मारने की सजा सुनाई। 

अंग्रेज को दिखाया विक्टरी साइन
स्वतंत्रता सेनानी चंदन लाल अग्रवाल बताते हैं कि उस समय कालसी और चकराता स्थित छावनी में अंग्रेज सैनिक रहा करते थे। देहरादून और सहारनपुर को जाने वाला रास्ता कच्चा था तो घोड़ा गाड़ी में बैठकर आजादी के एलान के बाद धीरे-धीरे अंग्रेजी सैनिक यहां से जाने लगे। जिन्हें लोग सड़क किनारे खड़े होकर विक्टरी साइन दिखाते हुए रवाना करते थे।
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