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टूट रहा पहाड़ का सब्र: उत्तराखंड में दर्द दे रहा मानसून, दो महीने में 90 लोगों की मौत, पढ़ें ये खास रिपोर्ट

Tue, 05 Sep 2023 01:24 PM IST
अलका त्यागी संवाद न्यूज एजेंसी, हल्द्वानी

सार

उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में पहाड़ टूटने का खतरा बताया गया था। इसमें रुद्रप्रयाग जिले को देश में भूस्खलन से सबसे अधिक खतरा बताया गया। भूस्खलन से जोखिम के मामले में देश के 10 सबसे अधिक संवेदनशील जिलों में टिहरी दूसरे स्थान पर है।
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उत्तराखंड में भूस्खलन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तराखंड में बारिश पहाड़ के लिए खुशियों के बजाय साल दर साल दर्द देकर जा रही है। साल 2013 में केदारनाथ में आई त्रासदी के बाद भी पहाड़ में अनियंत्रित तरीके से विकास थम नहीं रहा है, जिसके चलते प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला जारी है। इस साल भी 90 से अधिक लोगों की आपदा के चलते मौत हो गई, जबकि पिछले एक दशक में 5,300 से अधिक लोग असमय काल के गाल में समा चुके हैं। क्या आने वाले समय में हम प्राकृतिक आपदा और विकास के बीच कोई संतुलन बना पाएंगे या हिमालय के सब्र का बांध टूट जाएगा। अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट...

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शांत मानी जाने वालीं पहाड़ की वादियों में हलचल है। लगातार खिसक रही जमीन और दरकते मकान अब हर बरसात में यहां की नियति बन चुके हैं। कल-कल, छल-छल करतीं नदियां बरसात में उफान पर आती हैं तो यहां के बाशिंदे रातें जागकर गुजारने के लिए विवश हो जाते हैं। कई गांव आपदा के बाद से हाशिए पर हैं, जहां आसमान में बादल घिरते ही लोग घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हैं। कंक्रीट के बढ़ते जंगलों और सिमटती हरियाली से पहाड़ कमजोर हो गए हैं। हर साल प्रकृति की मार से हिमालय के सब्र का बांध टूट रहा है और वह दर्द से कराह रहा है। हाल ही में इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदी केंद्र (एनआरएससी) की रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है।

Uttarakhand Disaster: मानसून की बारिश से उत्तराखंड में हुआ बुरा हाल, तबाह हो गई 545 करोड़ की सड़कें और पुल
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एनआरएससी की भूस्खलन पर आधारित मानचित्र रिपोर्ट में उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में पहाड़ टूटने का खतरा बताया गया था। इसमें रुद्रप्रयाग जिले को देश में भूस्खलन से सबसे अधिक खतरा बताया गया। भूस्खलन से जोखिम के मामले में देश के 10 सबसे अधिक संवेदनशील जिलों में टिहरी दूसरे स्थान पर है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड का 72 प्रतिशत यानी 39 हजार वर्ग किमी क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित है।

दो महीने पहले शुरू हुई बारिश के बाद से प्राकृतिक आपदाओं में 90 लोग मौत के मुंह में चले गए जबकि 50 लोग घायल हुए हैं। वहीं 16 लोग अब भी लापता हैं। इनमें से 80 प्रतिशत से अधिक मौतें भूस्खलन के कारण हुई हैं।  इस साल बारिश से प्रदेश को हजार करोड़ से ज्यादा नुकसान हुआ है। 15 जून से शुरू हुए मानसून के बाद से अभी तक सड़कों और पुलों को 53548.85 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है। इस दौरान 3093 सड़कें और 91 पुल क्षतिग्रस्त हुए हैं। अकेले पुलों को ही सुधारने के लिए 11999.57 लाख रुपये चाहिए। सचिव लोनिवि डॉ. पंकज पांडेय ने बताया कि पुलों और सड़कों की क्षति का यह प्रारंभिक आकलन है।

मौसम की ऐसे पड़ी मार

नैनीताल : तकरीबन डेढ़ सौ साल से बलियानाला की पहाड़ी दरक रही है। पिछली बारिश में इसी पहाड़ी पर स्थित रईस होटल पूरा ढह गया था। हरिनगर क्षेत्र में रहने वाले 55 परिवारों को हर बारिश में अन्यत्र शिफ्ट होने के नोटिस जारी होते हैं। इसके उपचार के लिए 620 करोड़ की जायका योजना कारगर साबित नहीं हुई। खूपी गांव के लिए पाइंस नाला खतरे का सबब बना हुआ है।  

चंपावत : आपदा के दौरान मां पूर्णागिरि धाम में दुकानें बंद रहीं। चार जुलाई से 17 दिनों तक भारी मलबा आने से टनकपुर ककरालीगेट-ठुलीगाड़ सड़क बंद रही। 300 से अधिक श्रद्धालुओं को तीन दिन में निकाला जा सका। टनकपुर-जौलजीबी सड़क पर काम के दौरान जेसीबी ऑपरेटर की मौत हुई, 30 मकानों को नुकसान हुआ।

पिथौरागढ़ : सीमांत जिले में इस बार बारिश का रौद्र रूप देखने को नहीं मिला। हालांकि अलग-अलग घटनाओं में पांच लोगों की मौत हो गई। भूस्खलन से जिले में कुल 168 मकान क्षतिग्रस्त हुए। आपदा ने सबसे अधिक नुकसान सड़कों को पहुंचाया। नौ ग्रामीण सड़कें अब भी बंद हैं।  लिपुलेख सड़क बार-बार बंद होने से सीमा पर तैनात जवानों को दिक्कतें हो रही हैं।  

अल्मोड़ा : बारिश से अल्मोड़ा जिले में अब तक एक मकान पूर्णत: और 65 मकान आंशिक क्षतिग्रस्त हुए हैं। 18 मकानों को ज्यादा नुकसान हुआ है। बारिश से कहीं सड़क की सुरक्षा दीवार क्षतिग्रस्त हुई है तो, कहीं पैरापिट को नुकसान पहुंचा है। मलबा आने से जिले में सुनाड़ी-मल्ला बिनौला, बाजखेत-कनकोट-तालबुधानी ग्रामीण मोटर मार्ग यातायात के लिए अभी बंद है।

बागेश्वर : आपदा काल में अब तक दो लोगों की मौत हुई है। दोनों मामले कपकोट तहसील क्षेत्र के हैं। एक व्यक्ति की मौत पहाड़ी से गिरे बोल्डर की चपेट में आने से हुई तो एक व्यक्ति की जान बिजली गिरने से गई। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार अब तक 298 पशुओं की मौत हुई। 30 मकान पूर्ण रूप से ध्वस्त, 33 मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं।

ऊधमसिंह नगर : जिले के काशीपुर शहर में लगभग 15-20 वर्ष बाद बाढ़ और शहर में भारी जलभराव की समस्या खड़ी हुई है। ढेला में पांच मकान और एक झोपड़ी समा गए। 6 मकानों में दरारें आ गई। बाढ़ से 409 लोग प्रभावित हुए। एक मासूम सहित चार लोगों की डूबने से मौत हो गई। रुद्रपुर में कल्याणी नदी का जलस्तर बढ़ने से लोग परेशान रहे। 

चमोली : जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंदकिशोर जोशी ने बताया कि चमोली जनपद में अप्रैल से अभी तक आठ लोगों की अकाल मौत हुई है। विभिन्न विभागों की 79.42 करोड़ की परिसंपत्तियों की क्षति जबकि 23.706 हेक्टेयर कृषि क्षति का आकलन है। आपदा न्यूनीकरण के तहत 8 प्रस्तावों को 52.30 लाख तथा क्षतिग्रस्त पांच पुलों के लिए 35.22 लाख धनराशि स्वीकृत की गई है। औली को जोड़ने वाला वैकल्पिक मार्ग पर दरारें पड़ गई हैं। 

उत्तरकाशी : 15 जून से अब तक प्राकृतिक आपदा, वाहन हादसे में 15 लोगों की मौत हुई है। गंगोत्री हाईवे पर गंगनानी के पास हुए भूस्खलन में चार लोग जिंदा दफन हो गए थे। इस बार गंगोत्री-यमुनोत्री हाईवे को भारी नुकसान पहुंचा है। कई पुश्तों-पुलियों को क्षति पहुंची है। भूस्खलन क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर नुकसान हुआ है।

रुद्रप्रयाग : केदारनाथ के बायीं और दायीं दोनों तरफ भूस्खलन जोन सक्रिय है। रामबाड़ा से गरुड़चट्टी तक मंदाकिनी नदी के दोनों ओर भूकटाव हो रहा है। गौरीकुंड से सोनप्रयाग तक हालात बेहद नाजुक हैं। जुलाई में केदारघाटी के रेल गांव में बादल फटने से व्यापक नुकसान हुआ। बीते 3 अगस्त को गौरीकुंड में भूस्खलन से तीन अस्थायी दुकानें बह गईं थीं। इसमें 23 लोग लापता हो गए थे। 10 शव बरामद हो चुके हैं। 13 लोग लापता हैं। दो दिन बाद गौरी गांव में भूस्खलन की चपेट में दो आने से मासूम बच्चों की मौत हो गई थी। 10 अगस्त को रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राजमार्ग पर फाटा के समीप पहाड़ी का बड़ा हिस्सा टूटने से एक वाहन दब गया था, जिसमें सवार पांच लोगों की मौत हो गई थी।

टिहरी : तेज बारिश से हुए भूधंसाव के कारण जिले में कई गांव खतरे की जद में आ गए। दस साल में अभी तक 16 गांवों के 455 परिवारों का पुनर्वास किया गया। उनके घर खतरे में आने पर उन्हें सुरक्षित जगह घर बनाने के लिए 4.25 लाख रुपये प्रतिपरिवार की दर से 19 करोड़ 28 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया है। अभी 12 गांव खतरे की जद में है, जिनका भूगर्भीय सर्वे होना बाकी है। आपदा में वर्ष 2017 से अभी तक 59 लोगों ने अपनी जान गंवाई है।

भूस्खलन का ग्राफ बढ़ा

उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने वर्ल्ड बैंक की मदद से भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र का अध्ययन किया है। उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव रंजीत सिन्हा ने बताया कि इस सर्वे में पांच नदियों की घाटियों पर रिस्क असेसमेंट किया गया था, जिसकी रिपोर्ट से पता चलता है कि उत्तराखंड में बढ़ते लैंडस्लाइड जोन किसी बड़े खतरे से कम नहीं हैं।  इसके पीछे पहाड़ों पर असंतुलित विकास कार्य भी हैं, जिसमें जल विद्युत परियोजनाएं और सड़कें शामिल हैं। गढ़वाल में उत्तरकाशी जिले के हाईवे पर लैंडस्लाइड जोन तैयार हो चुके हैं, टिहरी जिले के अंतर्गत चार धाम मार्ग क्षेत्र पर भी बड़े लैंडस्लाइड जोन हैं। कुमाऊं में भी चंपावत और अल्मोड़ा में खतरनाक लैंडस्लाइड जोन सक्रिय हैं। अब जरूरत है, रिपोर्ट के आधार पर कार्ययोजना तैयार करने की, ताकि लैंडस्लाइड जोन से खतरे को कम किया जा सके और इसके ट्रीटमेंट के जरिए प्रदेश के लिए विकल्प भी तलाशे जा सकें।

पहाड़ पर बेतरतीब निर्माण

केदारनाथ आपदा के दस वर्ष बाद भी भवन निर्माण को लेकर कोई नीति नहीं बन पाई। नदी हो चाहे गाड़-गदेरों के किनारे अंधाधुंध निर्माण हो रहा है। स्थिति यह है कि व्यापारिक गतिविधियों के नाम पर दो से तीन मंजिला भवन, ताश की गड्डी की तरह खड़े हो रहे हैं, जो कभी भी किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। हैरत यह है कि ऑलवेदर रोड परियोजना में बदरीनाथ व गौरीकुंड हाईवे का चौड़ीकरण तो मानकों के तहत नहीं हो पाया। दोनों हाईवे पर भी बाजारों और कस्बों में दोतरफा नए निर्माण जमकर हुए हैं, जिससे हाईवे और संकरा हो गया है। कमोवेश कुछ ऐसी ही स्थिित उत्तराखंड के अन्य पर्वतीय जिलों में भी है। 

शहरों की धारण क्षमता का किया जाएगा अध्ययन

हिमाचल में भारी बारिश से हुए भूस्खलन के कारण भवनों के गिरने के हादसे सामने आए हैं। मसूरी, नैनीताल सरीखे शहरों पर भी अंधाधुंध शहरीकरण का हाल शिमला जैसा ही है। इन हादसों से उत्तराखंड सरकार पर शहरों की धारण क्षमता का अध्ययन करने का दबाव बना है। प्रदेश में पहले चरण में 15 शहरों का अध्ययय किया जाएगा। इसमें ने मसूरी, नैनीताल, पौड़ी, कर्णप्रयाग, नई टिहरी, उत्तरकाशी, लैंसडौन, रानीखेत, नैनीताल, कपकोट, धारचूला, चंपावत, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, भवाली शामिल हैं।

विशेषज्ञ एजेंसी इन पहलुओं पर करेगी जांच

सचिव आपदा प्रबंधन डॉ. रंजीत कुमार सिन्हा ने बताया कि आपदा प्रबंधन विभाग के उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी है। अध्ययन के लिए विशेषज्ञ एजेंसियों को सूचीबद्ध किया जाएगा। विशेषज्ञ एजेंसी पर्वतीय शहरों में खतरे के लिए जिम्मेदार हर पहलू की जांच करेगी। मसलन, कितने डिग्री ढलान पर भवनों का निर्माण हो रहा है। कितने ढलान पर कितनी मंजिल के ऐसे भवन हैं, जो आपदा के लिहाज से खतरे में हैं। कितने डिग्री ढलान पर कितनी मंजिल के भवन बनाए जाने चाहिए। पर्वतीय शहरों के वे कौन सी भूमि व स्थान हैं, जहां भवन बनाया जाना खतरनाक हो सकता है।
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पहाड़ पर बहुमंजिला इमारतों पर तत्काल लगे रोक : जोशी

पहाड़ पर तत्काल बहुमंजिला इमारतों पर रोक लगानी चाहिए। दो मंजिला से ज्यादा निर्माण नहीं होना चाहिए। इसके लिए सरकार को नियम बनाकर उसका क्रियान्वयन भी सुनिश्चित कराना चाहिए। साथ ही पर्वतीय जिलों में सड़कों के निर्माण की शैली भी बदलने जरूरत है। यहां भारी मशीनों से बनने वाली सड़क के बजाय नई तकनीकी पर विचार करना चाहिए जिससे पहाड़ कटान के दौरान हिमालय के भीतर होने वाली हलचल को कुछ हद तक रोका जा सके। ठेकेदारी प्रथा की वजह से ही पहाड़ों का सीना बेतरतीब तरीके से छलनी किया जा रहा है। इसे बंद करना चाहिए। ऊर्जा के लिए बड़े बांधों के बजाय छोटे बांध बनाने चािहए आैर प्रदेश सरकार इनका ग्रिड बना सकती है। पर्वतीय जिलों में वहां की भार क्षमता का आकलन करने के बाद ही इमारतें बननी चाहिए।
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