मशरूम के एक बड़े प्रशिक्षण केंद्र का विचार बेहतर है और इस पर काम किया जाएगा। प्रदेश सरकार मशरूम का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बना रही है और इसमें शोध, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था भी की जाएगी।
- सुबोध उनियाल, कृषि एवं उद्यान मंत्री
जंगली मशरूम की 15 प्रजातियां हैं उत्तराखंड में
में जंगलों में उगने वाले मशरूम की करीब 15 प्रजातियां चिह्नित की गई है। वन अनुसंधान केंद्र को अब चकराता में देवबंद और कुमाऊं में मुन्स्यारी में मशरूम पर शोध करने की अनुमति भी मिल गई है। जंगल में पैदा होने वाली गुच्छी मशरूम की कीमत तो करीब 30 हजार रुपये किलो है। इस पर अब शोध किया जा रहा है कि इस मशरूम की क्या खेती भी की जा सकती है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो उत्तराखंड को इससे फायदा होगा। यह मशरूम लोगों की फूड बास्केट में शामिल है और व्यवसायिक उत्पादन होने पर यह उत्पादकों की आय को बढ़ाने का बड़ा जरिया होगा।
- संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक, वन अनुसंधान केेंद्र, हल्द्वानी
18000 रुपये तक आय में इजाफा संभव
अल्मोड़ा स्थित विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के एक शोध के मुताबिक पर्वतीय क्षेत्रों में मशरूम का उत्पादन किसानों की आय में 18000 रुपये तक का इजाफा कर सकता है और इस क्षेत्र में सात प्रतिशत तक रोजगार देने की क्षमता है। शोध के मुताबिक आय में इजाफा इससे भी अधिक हो सकता है लेकिन मार्केटिंग की सटीक व्यवस्था न होने, मशरूम महंगा होने, स्थानीय मांग में उतार चढ़ाव इसमें आड़े आते हैं।
1886 : भारत में एन न्यूटन ने यहां पाई जाने वाली मशरूम की कुछ प्रजातियों को हार्टीकल्चर सोसायटी ऑफ इंडिया के वार्षिक कार्यक्रम में प्रदर्शित किया। मशरूम का उपयोग लोग खाने में पहले से ही करते थे।
1887 : कलकत्ता मेडिकल कालेज के डा. बीसी राय ने मशरूम का रासायनिक विश्लेषण किया।
1908 : देश में खाने योग्य मशरूम की खोज सर डेविड राम ने शुरू की
1921 : दो प्रजातियों का उत्पादन किया गया
1939-45 : मद्रास कृषि विभाग ने पैडी मशरूम को उगाने की शुरुआत की
1961 : हिमाचल ने भारतीय कृषि एवं अनुसंधान केंद्र की मदद से मशरूम विकास परियोजना शुरू की। देश में एक खास प्रजाति को उगाने का यह पहला प्रयास
1977 : तत्कालीन केंद्र सरकार ने 1.27 करोड़ की लागत वाली मशरूम विकास परियोजना शुरू की
1982 : नेशनल सेंटर फॉर मशरूम रिसर्च एंड ट्रेनिंग की स्थापना
कीड़ा जड़ी भी एक तरह से मशरूम
वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक लाखों की कीमत वाली कीड़ा जड़ी भी मशरूम ही है। कुछ देशों में तो इसकी खेती भी हो रही है। प्रदेश में यह वन उपज में शामिल है। हालांकि कुछ स्थानों पर इसका उत्पादन भी किया जा रहा है।