उत्तरप्रदेश के निकाय चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने से उत्तराखंड कांग्रेस सदमे में है। प्रदेश में चार महीने बाद स्थानीय निकायों के चुनाव है। मगर इन चुनाव को लेकर प्रदेश कांग्रेस मजबूत होमवर्क करती नजर नहीं आ रही है।
यूपी के चुनाव प्रदेश संगठन के लिए महज झटका नहीं है, बल्कि कड़ा सबक भी हैं। मगर कांग्रेस नेता सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। विधानसभा चुनाव में जिस गुटबाजी के कारण पार्टी की लुटिया डूबी, उससे उसका अभी तक पीछा नहीं छूटा है। सीमा विस्तार के मुद्दे पर ही शीर्ष नेताओं की अपनी ढपली, अपना राग है।
निकायों के सीमा विस्तार पर पार्टी खुद को निसंदेह मुखर दिखा रही है। लेकिन इस मसले पर भी उसका एकजुट संघर्ष नदारद है। इसकी दो ताजा बानगी सामने है। पहली नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश से मुत्तालिक है। नेता प्रतिपक्ष के नाते उन्होंने विधानसभा में प्रेस कांफ्रेंस की। मगर विपक्ष की नेता के साथ एक भी वरिष्ठ विधायक मौजूद नहीं था।
बेशक ये इत्तफाक हो, लेकिन प्रेस कांफ्रेंस के लिए विधानसभा में उठाए जाने वाले प्रमुख मुद्दों के बारे में बताने के लिए उन्होंने ऐसा दिन चुना, जब प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और वरिष्ठ विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल राजधानी से बाहर थे।