मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के दिल्ली जाने के बाद उत्तराखंड की सियासत में यह सवाल गरमाता रहा कि दिल्ली में क्या हुआ? सियासी दलों के दफ्तरों से लेकर राज्य सचिवालय के गलियारों में हर दिल्ली की खबर जानने को बेताब था। देर रात तक अटकलों का बाजार गरमाता रहा।
भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के पर्यवेक्षक भेजे जाने के बाद से ही प्रदेश की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। हालांकि पार्टी और सीएम खेमा इन चर्चाओं का लगातार खंडन करता रहा।
लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र अचानक दिल्ली के लिए उड़े तो चर्चाएं एक फिर तेजी से गरमाने लगी। इन चर्चाओं में सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन ही नहीं त्रिवेंद्र के संभावित उत्तराधिकारियों के नाम भी तैरने लगे। हालांकि संगठन के स्तर पर इन चर्चाओं का पूरी तरह से खंडन किया गया। उधर, राज्य सचिवालय में नौकरशाहों से लेकर अनुसेवकों तक सभी की जुबान पर यह प्रश्न था कि मुख्यमंत्री के अचानक दिल्ली जाने के क्या सियासी मायने हैं? केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तराखंड में क्या करने जा रहा है?
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि बजट सत्र को बीच में छोड़ने से साबित हो रहा है कि भाजपा में जबरदस्त अंदरूनी घमासान है। प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि विपक्ष ने सदन के भीतर महंगाई, बेरोजगारी, किसान, मातृशक्ति पर लाठीचार्ज, आपदा प्रबंधन, गन्ना किसान सहित सभी जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरा।
सरकार का सदन के अंदर प्रदर्शन देखकर ही विपक्ष को इस बात का अंदाजा हो गया था कि सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। उसकी पुष्टि शनिवार को देहरादून में सियासी भूचाल से हो गई। सदन में कोई भी मंत्री प्रश्नकाल के दौरान विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे पाया।
प्रीतम सिंह ने कहा कि बजट जैसे गंभीर मुद्दे के बावजूद त्रिवेंद्र सिंह रावत और उनके ज्यादातर विधायकों को भराड़ीसैंण के सत्र को बीच में छोड़कर देहरादून तलब किया जाना भाजपा में आये बड़े तूफान की ओर इशारा करता है।
नेतृत्व परिवर्तन के सवाल को प्रीतम सिंह ने भाजपा का अंदरूनी मामला बताया और कहा कि केवल नेतृत्व परिवर्तन से भाजपा की असफलता छिपने वाली नहीं है। लोगों ने भाजपा को प्रचंड बहुमत और डबल इंजन वाली सरकार दी लेकिन भाजपा ने कदम-कदम पर जनता को निराश किया।
प्रीतम सिंह ने कहा कि अब यह बात साफ हो गई है कि भाजपा सरकार का मन गैरसैंण में नहीं लगता। सरकार के पास विधायकों के क्षेत्र की समस्यायें सुनने का वक्त नहीं है। वह आपसी कलह निपटाने में पूरे चार साल व्यतीत कर गई। भाजपा का ध्येय मात्र सत्ता प्राप्ति ही रहता है।