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उत्तराखंड : केदारनाथ आपदा के बाद कई सुधार हुए, लेकिन उच्च हिमालय क्षेत्र अब भी अंधकार युग में 

Mon, 08 Feb 2021 02:01 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
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केदारनाथ आपदा - फोटो : अमर उजाला (File Photo)
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मौसम में हो रहे बदलाव को न समझना और उसके प्रभाव को कम करने के लिए काम न होना भी भारी पड़ रहा है। 16-17 जून 2013 की केदारनाथ आपदा का पहला सबक ही यह था कि उत्तराखंड में खतरे की पूर्व चेतावनी का तंत्र विकसित किया जाए।

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Uttarakhand Glacier Burst: इस बार कुदरत ने किया कुछ रहम, 2013 की आपदा में एकदम उलट थे हालात

इससे पहले 2006 में डा. आरएस टोलिया की अध्यक्षता में बनी माउंटने टास्क फोर्स ने उच्च हिमालय को जानकारी के हिसाब से अंधकार युग का बताया था और ग्लेशियरों की पूरी जानकारी जुटाने की संस्तुति की थी। केदारनाथ आपदा के बाद इसे शिद्दत से महसूस किया गया। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र और आईसीआईमोड ने ग्लेश्यिर की जानकारी जुटानी भी शुरू की लेकिन अब भी बहुत कुछ पता नहीं है।
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मौसम बदलाव का ही सबब है कि नीति घाटी में बादल फटने से लेकर अतिवृष्टि तक के मामले सामने आ रहे हैं। लेकिन यह सब मानसून तक ही सीमित था। अब फरवरी में अचानक बाढ़ का यह पहला मामला सामने आया है। जाहिर है कि मौसम के बदलाव के कारण कुदरत की चौंकाने की क्षमता बहुत बढ़ गई है।

क्या-क्या हुआ अब तक

-प्रदेश में एक डॉप्लर रडार ने काम करना शुरू कर दिया है। दूसरा डॉप्लर रडार पौड़ी में छह माह के अंदर स्थापित होने का दावा किया जा रहा है। इसके अलावा दो और डाप्लर रडार लगाए जा रहे हैं।
-प्रदेश में अब एसडीआरएफ का पूरा तंत्र हैं और खोज और बचाव की व्यवस्था भी हो पाई है। कुछ समय पहले ही अचानक बाढ़, भूस्खलन और भूकंप की  मल्टी हेजार्ड मॉक ड्रिल भी की गई थी। 
-खतरे की पूर्व चेतावनी के लिए प्रदेश में 176 से अधिक मौसम केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं। प्रदेश में इंसीडेंट रिस्पांस सिस्टम लागू है। 
अभी इन मामलों को लेकर काम होना बाकी 
-प्रदेश में जीएलओएफ या ग्लेश्यिर के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ को लेकर तैयारी न के बराबर है। 
-सुबह 9.30 से लेकर 10.00 बजे के बीच की घटना का कारण देर रात तक साफ नहीं हो पाया था। इस क्षेत्र में दो मौसम स्टेशन भी हैं और अंतरिक्ष उपयोग केंद्र ने एक हफ्ता पहले समीक्षा भी की थी। जाहिर है कि माइक्रो स्तर पर जानकारी न होने से तस्वीर साफ नहीं हो पाई। 
 
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जानकारी का अभाव, कारण साफ नहीं

अभी यह साफ नहीं है कि चमोली की नीति घाटी की इस घटना के पीछे क्या कारण होगा। इसे हिमस्खलन का नतीजा बताया जा रहा है। अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के मुताबिक झील फटने की आशंका न के बराबर है। लेकिन यह भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि इसके पीछे हिमस्खलन ही एक बड़ा कारण है। 

इस तरह से बढ़ रही हैं हिमालय में झीलें

1976-39
1990-88
1999-129
2011-217

(2012 से लेकर 2020 तक की अवधि में किए गए एक शोध के मुताबिक उत्तराखंड में ग्लेशियर के पिघलने के कारण बनने वाली करीब पांच झीलें हैं जो खतरनाक हो सकती है। यह भी पाया गया है कि ग्लेश्यिरों के पिघलने के कारण नई झीलें लगातार बन रही हैं और इन झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। 0.85 वर्ग किलोमीटर से लेकर 3.36 वर्ग किलोमीटर तक झीलें उच्च हिमालयी क्षेत्र में बन रही हैं।)
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