सवाल: समान नागरिक संहिता से आदिवासियों को बाहर क्यों रखा गया?
जवाब : भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड 25, सहपठित अनुच्छेद 342 के अंतर्गत तथा अनूसूचि छह के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है। ड्राफ्ट समिति ने माना कि प्रदेश में निवास कर रही जनजातियों में महिलाओं की स्थिति प्रदेश में अन्य वर्गों की तुलना में कहीं अधिक बेहतर है।
सवाल : समान नागरिक संहिता किन पर लागू होगी?
जवाब: राज्य के मूल निवासी व स्थायी निवासियों पर। राज्य सरकार या उसके किसी उपक्रम के स्थायी कर्मचारी, केंद्र या उसके किसी उपक्रम के राज्य में तैनात स्थायी कर्मचारी, राज्य में कम से कम एक वर्ष से निवास कर रहे व्यक्ति, राज्य या केंद्र की योजनाओं के लाभार्थी, जिसने राज्य निवासी होने का लाभ लिया हो।
सवाल : विवाह की आयु में कोई परिवर्तन क्यों नहीं किया गया?
जवाब : मुस्लिम वर्ग के अतिरिक्त सभी वर्गों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष, लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित है। मुस्लिम वर्ग के लिए न्यूनतम आयु उसका मासिक धर्म प्रारंभ होने से मानी जाती है। अब सबके लिए यह आयु समान होगी।
सवाल : यूसीसी में आनंद मैरिज एक्ट के लिए क्या कहा गया है?
जवाब : किसी भी वर्ग में विवाह के अनुष्ठानों पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया गया। सप्तपदि, आशीर्वाद, निकाह, पवित्र बंधन, आनंद कारज, आर्य समाज विवाह, विशेष विवाह अधिनियम को इसमें संरक्षित किया गया।
सवाल : अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम प्रदेश में पहले से लागू है तो अब इसे समान नागरिक संहिता में लाने की जरूरत क्यों?
जवाब : वह अधिनियम समान नागरिक संहिता आने के बाद समाप्त हो जाएगा।
सवाल : अगर कोई विवाह का रजिस्ट्रेशन नहीं कराएगा तो क्या वह निरस्त होगा?
जवाब : ऐसा विवाह निरस्त नहीं माना जाएगा बल्कि उस पर यूसीसी के प्रावधानों के तहत दंडात्मक कार्रवाई होगी।
सवाल : तलाक के लिए समान नागरिक संहिता में क्या तरीके होंगे?
जवाब : बिना न्यायिक प्रक्रिया अपनाए कोई भी विवाह विच्छेद नहीं होगा। ऐसा करने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सवाल : समान नागरिक संहिता में पुत्र, पुत्री के बीच संपत्ति का बंटवार क्या समान होगा?
जवाब : हां
सवाल : यूसीसी में मृतक की संपत्तियों का विभाजन कैसे होगा?
जवाब: संपत्ति शब्द को हटाकर संपदा शब्द का प्रयोग यूसीसी में किया गया है। इसमें मृतक की सभी प्रकार की संपत्तियां जैसे चल, अचल, स्वयं अर्जित, पैतृक या जन्गम या संयुक्त, मूर्त या अमूर्त या ऐसी किसी भी संपत्ति में कोई भी हिस्सा, हित या अधिकारी को सम्मिलित किया गया है। यूसीसी लागू होने के बाद पैतृक संपत्ति अब व्यक्ति की स्वयं अर्जित संपत्ति ही मानी जाएगी। और उसका विभाजन उसके उत्तराधिकारियों के बीच स्वयं अर्जित संपत्ति के अनुसार ही किया जाएगा।
सवाल : कोई व्यक्ति अपनी कितनी संपदा की वसीयत कर सकता है?
जवाब: कोई भी व्यक्ति अपनी पूरी संपदा की वसीयत कर सकता है। यूसीसी लागू होने से पहले मुस्लिम, ईसाई एवं पारसी समुदायों के लिए वसीयत के पृथक नियम थे, जो अब सबके लिए समान होंगे।
क्या कहते हैं कानूनविद्
लिव इन रिलेशनशिप के विवाद कम होंगे
सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है। इसमें वर्ग विशेष की महिलाओं को लाभ मिलेगा। सबसे अच्छी बात है कि लिव इन रिलेशनशिप का भी रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। ऐसे में इस तरह के रिश्तों के बाद जो विवाद होते थे उनमें कमी आएगी। एक तरह से ये भी वैध हो जाएंगे। इस रिश्ते से यदि कोई संतान होती है तो उसे भी हक मिलेगा।
-एमएम लांबा, पूर्व अध्यक्ष बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड
संहिता की धरा 7(2) घ स्पष्ट नहीं
उत्तराखंड सिविल संहिता देर से उठाया गया अच्छा कदम है। यह समय की मांग थी क्योंकि जब संविधान बना था तब देश की परिस्थितियों कुछ और थी वर्तमान में कुछ और है धारा 7 में विवाह के लिए नियम बनाए गए हैं। इसमें उम्र भी निर्धारित की गई है। कम उम्र में शादी करने से कई समस्याएं पैदा होती थी जो अब समाप्त हो जाएंगी। दोनों पक्षों का अविवाहित होना अनिवार्य किया गया है। यह स्वागत योग्य है। इसके अलावा अतिरिक्त प्रतिबंधित नातेदारी के बीच विवाह को मान्यता नहीं दी गई है। जब तक कि उन्हें शासित करने वाली रूढ़ी अनुमन्य न करती हो। विवाह के पंजीकरण को भी अनिवार्य करना स्वागत योग्य है। हालांकि, इस संहिता की धारा 7(2)(घ) स्पष्ट नहीं है।
-आलोक घिल्डियाल, वरिष्ठ अधिवक्ता
सबसे ज्यादा लाभ महिलाओं को होगा
समान नागरिक संहिता में जो प्रावधान किए गए हैं उनसे सबसे अधिक महिलाओं को लाभ होगा। जाति धर्म से इतर महिलाओं को पुरुषों के समान उत्तराधिकार प्राप्त होंगे। कृषि भूमि में भी महिलाओं को बराबरी का हिस्सा मिलेगा। धर्म विशेष की महिलाओं की विवाह, विवाह विच्छेद व बच्चों को गोद लेने की स्वतंत्रता भी मिलेगी। इसके अलावा विवाद के बगैर ही समाज में सहवासी के रूप में रहने वाले नागरिकों के पंजीकरण से उनसे पैदा होने वाली संतानों को सामाजिक व विधिक संरक्षण मिलेगा। सभी को समान अधिकार प्राप्त हों ऐसी परिकल्पना करने वाले संविधान निर्माताओं को अधूरे रह गए कार्यों को पूर्ण होते देख देवलोक में भी हर्ष होगा।
-अरुण सक्सेना, वरिष्ठ अधिवक्ता
विवाह पंजीकरण के समय सीमा से कम होगा फर्जीवाड़ा
पहले विवाह के पंजीकरण के लिए छह माह का समय होता था। लेकिन, इसमें भी लोग अपनी जरुरत के हिसाब से पंजीकरण कराते थे। अब इसे दो माह कर दिया गया है। इससे भविष्य में फर्जीवाड़े कम होंगे। आज उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता बिल पेश किया गया है जो कि सभी धर्मो व समुदाय पर लागू होगा। इस कानून से पिता की संपति में पुत्र और पुत्री को बराबर का अधिकार होगा जो कि अभी तक नही था,चाहे वे किसी भी धर्म के हों। शादी के लिए उम्र सीमा का पालन न करने पर सजा का भी प्रावधान है। शादी का पंजीकरण कराया जाना अनिवार्य होगा। बहू विवाह की प्रथा पर रोक लगेगी। इस कानून से सभी धर्मों की महिलाओं को अत्यधिक लाभ होंगे, जो उन्हें इस से पूर्व नही मिल पा रहे थे।
-सुरेंद्र सिंह पुंडीर, सदस्य, बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड
पारिवारिक विवादों पर लगेगा अंकुश
समान नागरिक संहिता से हर धर्म, जाति अथवा संप्रदाय से जुड़े दीवानी वाद जैसे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण आदि विषयों के लिए समान कानून होगा। इन कानूनों में धर्म के अड़ंगे नहीं बल्कि संविधान-प्रदत्त सुगमता की छवि होगी। विधेयक ऐसा वातावरण तैयार करेगा जिसमें किसी भी महिला को वह यातना नहीं झेलनी पड़ेगी जो किसी समय में शाहबानो बेगम और सरला मुद्गल जैसी अनेक महिलाओं ने झेली थी।
-मनमोहन कंडवाल, पूर्व अध्यक्ष बार एसोसिएशन देहरादून