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उत्तराखंड सत्ता संग्राम 2022: 27 गांव के बच्चों ने बनाया मांग पत्र, कहा- हम वोटर नहीं, इसलिए कोई नहीं सुनता हमारे मुद्दे

Sat, 22 Jan 2022 03:52 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal रेनू सकलानी , अमर उजाला, देहरादून

सार

हम बच्चे वोट नहीं देते, इसलिए हमारी समस्याओं को न तो तवज्जों दी जाती है, और न हमारी समस्याओं से किसी जनप्रतिनिधि को कोई मतलब है।
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- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जर्जर भवनों में बैठकर पढ़ना हमारी मजबूरी है। खेल के लिए मैदान नहीं है। घरों में पानी नहीं आता, इसलिए मीलों दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। ऐसी ही हमारी कई समस्याएं हैं, लेकिन हम बच्चे वोट नहीं देते, इसलिए हमारी समस्याओं को न तो तवज्जों दी जाती है, और न हमारी समस्याओं से किसी जनप्रतिनिधि को कोई मतलब है।

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वोटर्स को लुभाने के लिए हर राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में तरह-तरह के लुभावने वादे करते हैं, लेकिन किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में बच्चों के लिए कुछ नहीं होता। चुनावी माहौल को देखते हुए आयोजित हुई बाल संगठनों की बैठक में 27 गांव, बस्ती व शहर के 1253 बच्चों ने अपना मांग पत्र बनाया है।

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पर्वतीय बाल मंच देहरादून की ओर से आगामी विधानसभा चुनाव के माहौल को देखते हुए बच्चों के साथ एक पहल की गई, जिससे बच्चे जनप्रतिनिधियों तक अपने मुद्दे भी पंहुचा सकें। बीते कुछ दिनों में अलग-अलग स्थानों पर बच्चों के साथ बैठक कर उनके मुद्दों को जाना गया। बच्चों ने कहा कि चुनाव के समय तो हर वर्ग के बारे में बात की जाती है, लेकिन बच्चों की समस्या पूछने  कोई नहीं आता।

देहरादून, विकास नगर सहित आसपास के 27 गांवों के बाल संगठन के 1253 बच्चों ने बैठक में अपने-अपने मुद्दे उठाए। जिन समस्याओं के कारण वह जूझ रहे हैं। इन बैठकों के जरिए निकल कर आया कि सभी गांव में बच्चे लगभग एक जैसी समस्या से जूझ रहे हैं। जिनका समाधान जनप्रतिनिधि नहीं कर पाए। समस्याओं के सामने आने के बाद बच्चों ने भी अपना मांग पत्र तैयार किया। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उनके मांग पत्र पर गौर करने वाला कोई नहीं है।

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प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति बेहद खराब, जंगली जानवरों का भी भय 

उज्जवल बाल संगठन गोडरिया के ऋषभ चौरासिया (15), खुशी (14), विधि (14) और अमित (15) ने बताया कि उनके यहां प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति बेहद खराब है। जर्जर भवनों में उन्हें पढ़ना पड़ता है। ऐसे कुछ विद्यालय हैं, जहां चहारदीवारी ही नहीं है। हमारे लिए गांव में न तो खेल का मैदान है। और न ही खेल का सामान। जंगली जानवरों का भी भय है। 

मीलों दूर से पानी ढोकर लाना हम बच्चों की मजबूरी
उन्नति बाल संगठन रुद्रपुर के विकास (15), सानिया (16), सपना (15) और असमा (12) ने बताया हमारे गांव में पानी की भारी समस्या है, जिसकी वजह से हम बच्चों को भी मीलों दूर जाकर पानी लेकर आना पड़ता है। स्कूल में भी पानी की व्यवस्था नहीं है। कई बार गंदा पानी ही पीना मजबूरी होती है। 

बैठने के लिए फर्नीचर नहीं शौचालयों की भी परेशानी
खुशी बाल संगठन केदारावाला के मो. शाद ( 14), अमिशा (14) और खुशी (13) ने बताया कि कक्षा कक्षों में बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर की व्यवस्था ही नहीं है और कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों में भी शौचालय ही नहीं है। बताया कि बच्चों को कई बार बहुत ज्यादा परेशानी होती है। 

हमारे कई साथी बच्चे नहीं जाते स्कूल
आजाद कॉलोनी देहरादून की कशिश (15), लक्ष्मी (14), माही (12), अमन (14), अरमान (12) और आरूषी (9) ने बताया कि उनके क्षेत्र में कई बच्चे स्कूल ही नहीं जाते हैं। बताया कि हमारे लिए खेल का मैदान भी नहीं है। दूसरी जगह पर खेलने के लिए जाते हैं तो हमें भगा दिया जाता। यहां नालों की साफ-सफाई नहीं रहती, इसलिए बच्चे बीमार पड़ते हैं। 

इन बाल संगठनों ने उठाए मुद्दे
उन्नति बाल संगठन रुद्रपुर, उमंग बाल संगठन बालुवाला, आजाद कॉलोनी देहरादून, आर्दश बाल संगठन पसोली, उज्जवल बाल संगठन मल्लावाला, विश्व बाल संगठन बाडवाला, चेतना बाल संगठन अम्बाड़ी, विश्वास बाल संगठन ढाकोंवाला, मुस्कान बाल संगठन बुलाकिवाला, शिक्षा बाल संगठन मैंगवाला, सनाया बाल संगठन मुस्लिम बस्ती रुद्रपुर, जागृति बाल संगठन खेड़ापछुआ।

ये बात बिल्कुल सच है कि बच्चों को एक तरह से बिल्कुल अनदेखा किया जा रहा है। हमने लगातार कुछ दिन अलग-अलग बच्चों के साथ बैठक कर बातचीत की और उनके मुद्दों को जाना। चुनाव के दौरान हमारे जनप्रतिनिधि और नेता वोटर्स को साधने के लिए कई तरह की घोषणाएं करते हैं, लेकिन बच्चों के बारे में कोई बात नहीं करता। हमारे पहाड़ में बच्चे कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। 
- दीपिका पंवार, समन्वयक, चाइल्ड हेल्पलाइन
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