उज्जवल बाल संगठन गोडरिया के ऋषभ चौरासिया (15), खुशी (14), विधि (14) और अमित (15) ने बताया कि उनके यहां प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति बेहद खराब है। जर्जर भवनों में उन्हें पढ़ना पड़ता है। ऐसे कुछ विद्यालय हैं, जहां चहारदीवारी ही नहीं है। हमारे लिए गांव में न तो खेल का मैदान है। और न ही खेल का सामान। जंगली जानवरों का भी भय है।
मीलों दूर से पानी ढोकर लाना हम बच्चों की मजबूरी
उन्नति बाल संगठन रुद्रपुर के विकास (15), सानिया (16), सपना (15) और असमा (12) ने बताया हमारे गांव में पानी की भारी समस्या है, जिसकी वजह से हम बच्चों को भी मीलों दूर जाकर पानी लेकर आना पड़ता है। स्कूल में भी पानी की व्यवस्था नहीं है। कई बार गंदा पानी ही पीना मजबूरी होती है।
बैठने के लिए फर्नीचर नहीं शौचालयों की भी परेशानी
खुशी बाल संगठन केदारावाला के मो. शाद ( 14), अमिशा (14) और खुशी (13) ने बताया कि कक्षा कक्षों में बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर की व्यवस्था ही नहीं है और कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों में भी शौचालय ही नहीं है। बताया कि बच्चों को कई बार बहुत ज्यादा परेशानी होती है।
हमारे कई साथी बच्चे नहीं जाते स्कूल
आजाद कॉलोनी देहरादून की कशिश (15), लक्ष्मी (14), माही (12), अमन (14), अरमान (12) और आरूषी (9) ने बताया कि उनके क्षेत्र में कई बच्चे स्कूल ही नहीं जाते हैं। बताया कि हमारे लिए खेल का मैदान भी नहीं है। दूसरी जगह पर खेलने के लिए जाते हैं तो हमें भगा दिया जाता। यहां नालों की साफ-सफाई नहीं रहती, इसलिए बच्चे बीमार पड़ते हैं।
इन बाल संगठनों ने उठाए मुद्दे
उन्नति बाल संगठन रुद्रपुर, उमंग बाल संगठन बालुवाला, आजाद कॉलोनी देहरादून, आर्दश बाल संगठन पसोली, उज्जवल बाल संगठन मल्लावाला, विश्व बाल संगठन बाडवाला, चेतना बाल संगठन अम्बाड़ी, विश्वास बाल संगठन ढाकोंवाला, मुस्कान बाल संगठन बुलाकिवाला, शिक्षा बाल संगठन मैंगवाला, सनाया बाल संगठन मुस्लिम बस्ती रुद्रपुर, जागृति बाल संगठन खेड़ापछुआ।
ये बात बिल्कुल सच है कि बच्चों को एक तरह से बिल्कुल अनदेखा किया जा रहा है। हमने लगातार कुछ दिन अलग-अलग बच्चों के साथ बैठक कर बातचीत की और उनके मुद्दों को जाना। चुनाव के दौरान हमारे जनप्रतिनिधि और नेता वोटर्स को साधने के लिए कई तरह की घोषणाएं करते हैं, लेकिन बच्चों के बारे में कोई बात नहीं करता। हमारे पहाड़ में बच्चे कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं।
- दीपिका पंवार, समन्वयक, चाइल्ड हेल्पलाइन