उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा और कांग्रेस के हेवीवेट नेताओं के सियासी भविष्य को भी तय करेंगे। एग्जिट पोल के बाद दिग्गजों की धड़कने और बढ़ गई हैं।
पार्टी की जीत हार से ज्यादा हेवीवेट अपने सियासी कद की चिंता है। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव तय करेंगे कि हरीश रावत की पार्टी में अब क्या भूमिका रहेगी। जीतने पर उनका सीएम बनना तय माना जा रहा है, लेकिन हारे तो जिम्मेदारी लेने का दबाव भी उन पर रहेगा। जिससे पार्टी का सदन में नेता कोई नया चेहरा हो सकता है। जीतने-हारने पर कमोबेश यही स्थिति भाजपा के सामने रहेगी कि सदन में नेता या प्रतिपक्ष का ताज किसके सर सजता है।
मतगणना से पहले एग्जिट पोल्स ने भाजपा- कांग्रेस की धड़कने तेज कर दी हैं। नतीजों से पहले मिलने वाले रुझान के बाद दोनों दलों के हेवीवेट आने वाली सरकार में अपने समीकरणों को देख रहे हैं। भाजपा में पूर्व मुख्यमंत्रियों बीसी खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी, रमेश पोखरियाल निशंक और विजय बहुगुणा भले चुनाव मैदान में नहीं हैं, लेकिन हार जीत के तराजू में उनका कद भी तोला जाएगा।
भले ही इन चारों को सीएम की रेस में नहीं माना जा रहा है, लेकिन यह निर्णय भी अंतिम नहीं है। पार्टी अगर जीतती है तो पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का सीएम को लेकर फैसला अंतिम रहने वाला है। हालांकि ज्यादा संभावना जीते विधायकों से किसी एक को कुर्सी पर बैठाने की अधिक दिख रही है।
सतपाल महाराज को बताया जा रहा सीएम कैंडिडेट
सतपाल महाराज
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चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में कई नाम सीएम पद के दावेदारों में रहे हैं। सतपाल महाराज को केंद्रीय राजनीति से राज्य की सियासत में उतारने के पीछे का कारण उनको सीएम कैंडिडेट बताया जा रहा है। अजय भट्ट को प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बाद चुनाव संचालन का जिम्मा देकर पार्टी संकेत दे चुकी है कि वे भी रेस में पूरी तरह से हैं।
त्रिवेंद्र सिंह रावत और प्रकाश पंत का नाम भी सीएम के लिए चर्चाओं में है। त्रिवेंद्र को शाह का करीबी बताया जाता है। चुनाव में एक नाम धन सिंह रावत का भी उछाला गया। पीएम मोदी सहित तमाम केंद्रीय मंत्रियों ने उनकी विधानसभा में प्रचार कर यह दिखाया कि भाजपा के वे ‘लू आई ब्वाय’हैं। यह है भाजपा के अच्छे दिनों की बात। अगर पार्टी को हार मिलती है तो पूर्व मुख्यमंत्रियों से लेकर हेवीवेट माने जा रहे कई नपेंगें। भितरघात के आरोपों में कई के पार्टी पर कतर देगी।
उधर, कांग्रेस के लिए भी कमोबेश यही स्थिति रही है। पार्टी का चुनाव में चेहरा और रणनीतिकार सीएम हरीश रावत रहे। हार जीत की स्थिति में सियासी नफा और नुकसान उन्हीं को झेलना पड़ सकता है। अगर पार्टी बहुमत हासिल करती है तो रावत की बतौर सीएम अगली पारी शुरू होगी। उनके मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले विधायक पार्टी का अगला चेहरा होंगे। हारने की स्थिति में पार्टी की बागडोर किसे सौंपी जानी है इस पर भी मंथन पार्टी करेगी। हरीश रावत के अलावा इंदिरा हृदयेश और प्रीतम सिंह ही बड़े हैं, जिनका भविष्य इसी चुनाव से तय होना है। हालांकि इसका संकेत पार्टी सदन में किसे नेता प्रतिपक्ष चुनती है इससे भी तय होगा।
बागियों की साख टिकी है नतीजों पर
भाजपा में कांग्रेस से आए बागियों का भविष्य 11 मार्च को आने वाले नतीजों से जुड़ा है। जिन्हें पार्टी ने अब तक सिर आंखों पर बैठा रखा। उनका हारना या जीतना पार्टी में उनके रसूख को तय करेगी। चुनाव केवल उनके जीतने भर की अग्निपरीक्षा नहीं है बल्कि उनके आने से पार्टी को कितना फायदा नुकसान हुआ इसका आकलन भी भाजपा करेगी। हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य, शैलेंद्र मोहन सिंघल और सुबोध उनियाल की जीत हार बागियों के सबसे अहम रहेगी। यह चारों जीतने की स्थिति में मंत्री पद के दावेदार हैं, जबकि हारने के स्थिति में साइड लाइन भी हो सकते हैं। इनके अलावा दूसरे बागियों का भविष्य भी पार्टी की जीत हार से अधिक अपनी जीत हार पर टिका है।