देश के कई गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी को लेकर हिचकिचाहट का भाव रहा है। हिंदी और अन्य भाषाओं के बीच विवाद पैदा कराने की भी कई बार देश के भीतर कोशिश होती रही पर एक शख्स ऐसा भी है, जो देश के बाहर हिंदी की आवाज को दमदार तरीके से उठा रहा है।
उत्तराखंड के खेतीखान से ताल्लुक रखने वाले नामी साहित्यकार हिमांशु जोशी के बेटे अमित जोशी करीब दो दशक से नार्वे में हैं। वे वहां सांसद भी रहे और इस वक्त स्पेशल कार्यपालक जज भी हैं।
यूरोप के छोटे से देश नार्वे में उन्होंने हिंदी को आगे बढ़ाया है। इसके लिए उन्होंने शांति दूत नामकी पत्रिका से हिंदी को पहचान दी है। यह पत्रिका नार्वे से लेकर यूरोप के कई देशों में पढ़ी जाती है।