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उत्तराखंड के सैकड़ों अधिनियमों में बसता है यूपी का 'दिल'

Mon, 12 Dec 2016 09:42 AM IST
राकेश खंडूड़ी/ अमर उजाला, देहरादून
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11 साल से न्याय के ‌ल‌िए भटक रही है पीड़‌िता - फोटो : Demo
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उत्तराखंड में ज्यादातर अधिनियम उत्तरप्रदेश की फोटो कॉपी हैं और इनमें सिर्फ नाम ही बदला है। सोलह साल बाद प्रदेश का राजकाज उत्तरप्रदेश की कार्य नियमावली, 1975 से संचालित हो रहा है।
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यूपी की नियमावली से संचालित होने वाली सरकार जो कानून बनाती है, वे यूपी की छाया से बाहर नहीं निकल पाते हैं। राज्य गठन से लेकर अब तक राज्य की विधानसभा में 380 बिल पास हो चुके हैं मगर इनमें से ज्यादातर का दिल उत्तरप्रदेश में अटका है। ये सब तब हो रहा है जब राज्य के हुक्मरानों से लेकर नीति नियंता तक हिमाचल से प्रेरणा लेने की दुहाई देते आ रहे हैं।

किसी भी राज्य का कामकाज कार्य संचालन नियमावली से ही संचालित होता है। इससे ही कैबिनेट का कामकाज, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के कार्य अधिकार, सचिवालय का स्वरूप व उसकी कार्यप्रणाली निर्धारित होती है। लेकिन ये भी यूपी के हिसाब से ही है। इसका तो नाम तक बदलने की जहमत नहीं उठाई गई।
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ऐसा नहीं कि सोलह सालों में इस पर्वतीय राज्य में सरकारों ने अपने नियम-कायदे नहीं बनाए। इन वर्षों में राज्य की निर्वाचित विधानसभाओं ने कानून बनाने के लिए सैकड़ों बिलों को मंजूरी दी। वर्ष 2002- 2016 के दौरान 380 से ज्यादा बिल पास हो चुके हैं।

मगर अपवादस्वरूप कुछ बिलों को छोड़ दें तो अधिकांश बिलों की आत्मा’ आज भी उत्तरप्रदेश के कानूनों में बसती है। नतीजा यह है कि राज्य की सरकारों के बनाए ये अधिनियम पर्वतीय राज्य की जनाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। अलग राज्य की अवधारणा यूपी की कार्यसंस्कृति और रीति-नीति की चकाचौंध में ओझल है।

इसीलिए इन अधिनियमों को लेकर अकसर ये जुमलेबाजी होती है कि ज्यादातर कानून उत्तरप्रदेश की फोटो कॉपी है, जिसमें राज्य का सिर्फ नाम बदला है। इसकी सबसे ताजा मिसाल विवादों की वजह बनी पूर्व मुख्यमंत्रियों की सुविधाएं हैं। उत्तरप्रदेश से अंगीकार कर लिए नियम-कायदों के तहत ये सुविधाएं उन्हें आंख मूंद कर अनुमन्य कर दी गईं।

इसमें हुक्मरानों और नीति नियंताओं ने छोटे राज्य के सीमित संसाधनों के तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज किया। यदि न्यायिक आदेश न होता तो ये व्यवस्था आज भी चल रही होती। सच तो यह है कि राज्य की जरूरत के हिसाब से मौलिक कानूनों की कमी शिद्दत से अखर रही है।

कार्यकाल के अंतिम साल में सरकार राज्य का अपना त्रिस्तरीय पंचायती राज विधेयक और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए चकबंदी बिल विधानसभा में पारित कराने में जरूर कामयाब रही, मगर बगैर गंभीर और सार्थक चर्चा के पास हुए इन बिलों की उपयोगिता पर भी संदेह बना है। 

यूपी से मुत्तालिक करीब 21 कानूनों के बारे में सरकार को सुझाव दिए जा चुके हैं कि इनकी प्रासंगकिता राज्य में नहीं हैं, इन्हें हटाया जाए। साथ ही  मैदानी और पर्वतीय क्षेत्र के लिए उत्तराखंड लैंड रेवन्यू कोड बनाए जाने का सुझाव सरकार को दिया गया है। राज्य के कानूनों को पहाड़ की मिट्टी से जोड़ने की आवश्यकता है।
- जगमोहन सिंह नेगी, अध्यक्ष, राज्य विधि एवं परिसीमन आयोग

ये अध्ययन कर रहे हैं कि कौन-कौन से कानून राज्य हित में हो सकते हैं और राज्य हित के लिए कौन-कौन से कानून बनाए जाने चाहिए। आयोग इसी दिशा में काम कर रहा है।
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- भारतभूषण पाण्डेय, अपर सचिव, विधायी, सचिव, परिसीमन आयोग

मौजूदा सरकार में रिकार्ड विधेयक पास
वर्ष- बिलों की संख्या
2002-19
2003-35
2004-04
2005-31
2006-13
2007-13
2008-23
2009-25
2010-08
2011-26
2012-42
2013-34
2014-29
2015-26
2016-52
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कुल योग-380
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